अभय वाणीः केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने भरत तिवारी एनकाउंटर मामले पर एक बार फिर ऐसा बयान दिया है, जिसने पूरे घटनाक्रम को न्यायिक और संवैधानिक बहस से हटाकर जातीय और सामुदायिक विमर्श में धकेलने की कोशिश की है।
मांझी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में भरत तिवारी एनकाउंटर को सही ठहराते हुए सवाल उठाने वालों पर ही निशाना साधा। उन्होंने इसे जातीय और सामुदायिक नजरिए से जोड़ते हुए लिखा कि जब दलितों और मुसलमानों के एनकाउंटर पर सवाल नहीं उठते, तब भरत तिवारी के मामले में राजनीति क्यों हो रही है। मांझी ने यह भी कहा कि भरत तिवारी के पास अवैध हथियार था और पहले भी आपराधिक मामलों में उसकी गिरफ्तारी हो चुकी थी।
सवालों को जातीय रंग देने की कोशिश
मांझी का यह ताज़ा बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस खतरनाक प्रवृत्ति का उदाहरण है जिसमें राज्य हिंसा को वैध ठहराने के लिए जाति और पहचान का इस्तेमाल किया जाता है। भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में मांझी ने जिस तरह से बहस को “दलित बनाम सवर्ण” और “मुसलमान बनाम बहुसंख्यक” के फ्रेम में डालने की कोशिश की है, वह कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
सामाजिक न्याय की आड़ में नैरेटिव सेटिंग
मांझी ने अपने बयान में लिखा कि जब दलितों का एनकाउंटर होता है तो उन्हें “नक्सली” और मुसलमानों को “आतंकवादी” कहकर मार दिया जाता है, लेकिन भरत तिवारी के मामले में वही लोग सवाल उठा रहे हैं। पहली नजर में यह बयान सामाजिक न्याय की चिंता जैसा लग सकता है, लेकिन असल में यह पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच की मांग को जातीय रंग देकर कमजोर करने की कोशिश है।
क्या अवैध हथियार एनकाउंटर का लाइसेंस है?
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति के पास अवैध हथियार होना पुलिस को बिना न्यायिक प्रक्रिया के उसे मार देने का अधिकार देता है?
विडंबना देखिए, मांझी अपने ट्वीट में खुद पूछते हैं—“देश संविधान से चलेगा या फिर अवैध पिस्टल की नोक से?” मगर यही सवाल सबसे पहले राज्य और पुलिस से पूछा जाना चाहिए। क्योंकि संविधान यह नहीं कहता कि आरोप तय होते ही गोली चला दी जाए; संविधान कहता है कि अपराध सिद्ध होने तक हर व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया का अधिकारी है।
अगर भरत तिवारी पर आपराधिक मुकदमे थे, तो अदालत तय करती कि वह दोषी है या नहीं। लेकिन यहां मंत्री पहले ही “अपराधी” घोषित कर पुलिस की कार्रवाई को क्लीन चिट दे रहे हैं।
मांझी की राजनीतिक विरासत और वर्तमान विरोधाभास
विडंबना यह है कि मांझी खुद अपने राजनीतिक जीवन में दलित उत्पीड़न और सामाजिक न्याय की लड़ाई का चेहरा रहे हैं। ऐसे में उनसे अपेक्षा थी कि वे हर संदिग्ध एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच की मांग करते, न कि पुलिसिया कार्रवाई के पक्ष में खड़े होकर सवाल उठाने वालों को “जातिवादी मानसिकता” का तमगा देते।
सत्ता का बयान और जांच पर दबाव
यहां एक और गंभीर पहलू है—जब कोई केंद्रीय मंत्री किसी एनकाउंटर को जांच से पहले ही सही ठहराने लगता है, तो वह जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाता है। इससे निष्पक्षता प्रभावित होती है और लोकतंत्र की बुनियादी आत्मा कमजोर होती है।
न्याय बनाम पुलिसिया फैसला
भरत तिवारी कोई संत थे या अपराधी—यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या राज्य कानून के शासन से चलेगा या पुलिस की गोली से? अगर हर आरोपी को एनकाउंटर में मारना ही समाधान है, तो अदालतों, संविधान और न्याय व्यवस्था की क्या भूमिका रह जाएगी?
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं
मांझी का बयान इस पूरे मामले को और उलझाता है। यह न्याय की मांग को राजनीतिक षड्यंत्र बताने और संवैधानिक सवालों को जातीय विमर्श में बदलने की कोशिश है। लोकतंत्र में सत्ता का काम सवालों का जवाब देना है, सवाल पूछने वालों को कटघरे में खड़ा करना नहीं।
निष्पक्ष जांच ही लोकतंत्र की कसौटी
आज जरूरत इस बात की है कि भरत तिवारी एनकाउंटर की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो। क्योंकि सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहां सत्ता यह तय करने लगे कि कौन अपराधी है और कौन जीने का हकदार।
भरत तिवारी एनकाउंटर पर मांझी का ट्वीट
दलितों का एंकाउंटर हो तो “नक्सली था मारा गया”,
मुसलमान का एंकाउंटर हो तो “आतंकवादी था मारा गया”,
ऐसा कहने वाले लोग ही भरत तिवारी के एंकाउंटर पर सवाल उठा रहें हैं…
पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर भरत तिवारी के पास अवैध पिस्टल कहाँ से आया?
किन लोगों के शह पर इस आपराधिक वारदात पर… pic.twitter.com/h7iSkPFs68— Jitan Ram Manjhi (@jitanrmanjhi) June 23, 2026
