अभय वाणीः कभी-कभी कोई तारीख सिर्फ कैलेंडर का हिस्सा नहीं रहती, इतिहास का अध्याय बन जाती है। संसद परिसर तक छात्रों का विरोध प्रदर्शन ऐसी ही एक घटना है। यह सिर्फ कुछ युवाओं का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उस पीढ़ी का संदेश था जो बार-बार यह सुनने को मजबूर है कि “सब ठीक है”, जबकि वह अपने भविष्य को लेकर लगातार सवाल पूछ रही है।
जब सड़क से संसद तक पहुंची आवाज
लोकतंत्र में संसद जनता की सर्वोच्च संस्था है। वहां तक किसी छात्र का गुस्सा पहुंचना किसी भी सरकार के लिए चेतावनी है। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यवस्था खत्म हो गई है, बल्कि यह कि व्यवस्था और युवाओं के बीच संवाद कमजोर पड़ गया है।
देश का युवा आज केवल नौकरी नहीं मांग रहा। वह पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही भी चाहता है। चाहे प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप हों, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी हो या अवसरों की असमानता—इन मुद्दों ने युवाओं के भीतर गहरी बेचैनी पैदा की है। जब संस्थागत जवाब देर से आते हैं, तब सड़कें आवाज बन जाती हैं।
विरोध और व्यवस्था के बीच संतुलन
यह भी उतना ही सच है कि संसद की सुरक्षा और गरिमा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यदि किसी प्रदर्शन में सुरक्षा नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कानून अपना काम करे। लेकिन कानून की कार्रवाई और युवाओं की पीड़ा—दोनों को अलग-अलग नजर से देखने की जरूरत है। हर विरोध को अराजकता और हर प्रदर्शनकारी को अपराधी मान लेना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं होगा।
सरकार के सामने भरोसे की चुनौती
सरकारों की सबसे बड़ी ताकत केवल बहुमत नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होती है। यही भरोसा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ फूटा छात्रों का गुस्सा अब केवल एक मंत्री तक सीमित नहीं दिख रहा। उसकी राजनीतिक आंच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की विश्वसनीयता और जवाबदेही की भी परीक्षा बनती दिखाई दे रही है। युवाओं का भरोसा बनाए रखने का रास्ता मुकदमों, बयानबाजी या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी फैसलों और समयबद्ध जवाबों से निकलता है।
विपक्ष भी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं
यह घटना विपक्ष के लिए भी आईना है। केवल सत्ता की आलोचना कर देना पर्याप्त नहीं है। यदि युवाओं की समस्याओं पर राजनीति होगी, समाधान नहीं, तो निराशा और बढ़ेगी। छात्र किसी दल की भीड़ नहीं, देश की भविष्य की कार्यशक्ति हैं।
इतिहास क्या याद रखेगा?
इतिहास गवाह है कि भारत में बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलावों की शुरुआत अक्सर युवाओं ने ही की है। इसलिए संसद तक पहुंची यह आवाज किसी दल की जीत या हार नहीं, लोकतंत्र की धड़कन है। इसे सुनना, समझना और इसका जवाब देना सत्ता और विपक्ष—दोनों की जिम्मेदारी है।
शायद आने वाले वर्षों में यह तारीख इसलिए याद रखी जाएगी कि इस दिन देश के युवाओं ने सत्ता को यह याद दिलाया था—वे सिर्फ वोटर नहीं हैं, वे जागरूक नागरिक भी हैं; और सबसे महत्वपूर्ण, वे अब चुप रहने वाले नहीं हैं।
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक वह दिन नहीं होता जब युवा सड़क पर उतरते हैं, बल्कि वह दिन होता है जब युवा सवाल पूछना छोड़ देते हैं।
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