ले लोटाः कभी नेता जनता के बीच सड़क, बिजली, पानी और रोजगार का हिसाब लेकर जाते थे। अब विरोधी की मार्कशीट, डिग्री और विश्वविद्यालय का नाम लेकर निकल पड़ते हैं। ऐसा लगता है कि विधानसभा का चुनाव नहीं, किसी विश्वविद्यालय में एडमिशन की काउंसिलिंग चल रही है।
हर दल अपने प्रतिद्वंद्वी की शैक्षणिक योग्यता का स्वयंभू कुलपति बना बैठा है। कोई पूछ रहा है—”डिग्री कहां से ली?” दूसरा जवाब दे रहा है—”पहले अपनी दिखाओ।” तीसरा पुराने रजिस्टरों की धूल झाड़ रहा है। चौथा प्रमाणपत्रों की फॉरेंसिक जांच कराने पर आमादा है।
जनता भी हैरान है। जिसे नौकरी के लिए अपनी डिग्री दिखानी पड़ती है, वही अब नेताओं को दूसरों की डिग्री पर राजनीति करते देख रहा है। फर्क बस इतना है कि बेरोजगार युवक की डिग्री रोजगार नहीं दिला पा रही, लेकिन नेताओं की डिग्री खूब सुर्खियां दिला रही है।
हैरानी की बात यह है कि जिन नेताओं से पांच साल के काम का रिपोर्ट कार्ड मांगा जाना चाहिए, वे पांच दशक पुरानी मार्कशीट का हिसाब मांग रहे हैं। मानो जनता ने उन्हें शासन चलाने के लिए नहीं, विश्वविद्यालय का परीक्षा नियंत्रक बनाने के लिए वोट दिया हो।
बिहार की राजनीति में इन दिनों ऐसा माहौल है कि अगर कोई नेता गलती से रोजगार, उद्योग, शिक्षा या स्वास्थ्य की बात करने लगे तो बाकी लोग उसे बीच में टोक दें—”पहले अपनी डिग्री बताइए, फिर विकास की बात कीजिए।”
डिग्री पर सवाल उठाना गलत नहीं है। अगर किसी ने शैक्षणिक योग्यता के बारे में झूठ बोला है तो जवाब देना चाहिए। लेकिन जब पूरी राजनीति मार्कशीट के इर्द-गिर्द घूमने लगे और जनता के असली सवाल हाशिए पर चले जाएं, तब समझ लेना चाहिए कि चुनावी बहस का स्तर ऊपर नहीं, नीचे जा रहा है। बिहार की जनता को अब शायद नए चुनावी नारे का इंतजार है—”काम बाद में बताएंगे, पहले डिग्री मिलाइए!“
