Sunday, March 1, 2026

धुंधला क्यों है समाज का आईना? मीडिया की चकाचौंध के पीछे का अँधेरा

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‘न्यूज इंडिया’ चैनल (News India) के दफ्तर से जो चलचित्र वायरल हैं, उन्होंने आज की मीडिया के चाल-चरित्र को उजागर कर दिया है।’ यह वाक्य केवल एक घटना का उल्लेख नहीं, बल्कि उस गहरे संकट की ओर संकेत है जिसमें भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा फँसता जा रहा है। वह मीडिया जो कभी समाज का आईना कहलाती थी, आज स्वयं अपने चेहरे को ढँकने में लगी दिखाई देती है।

पत्रकारिता या जन-प्रबंधन का कारोबार?

मीडिया का मूल दायित्व है-सत्ता से सवाल करना, सच को सामने लाना और समाज के कमजोर वर्गों की आवाज़ बनना। लेकिन जब कैमरे के पीछे की सच्चाई कैमरे के सामने की सच्चाई से बिल्कुल अलग हो, तो भरोसे की बुनियाद हिल जाती है। वायरल हुए वीडियो केवल किसी एक संस्थान की चूक नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति का प्रतीक हैं जिसमें पत्रकारिता, जनसेवा से हटकर जन-प्रबंधन (मैनिपुलेशन) का औज़ार बनती जा रही है।

इस हमाम में सब नंगे हैं

यह स्वीकार करना होगा-यह हालत सिर्फ ‘न्यूज इंडिया’ की नहीं है। इस हमाम में सब नंगे हैं। नाम अलग-अलग हो सकते हैं, चेहरे बदल सकते हैं, पर प्रवृत्ति एक ही है। संस्थानों के मालिक मुनाफ़े की मशीन में बदल चुके हैं; उनके लिए खबर एक उत्पाद है और दर्शक एक ग्राहक। ‘कंटेंट’ बिकता है, इसलिए सच भी बिकाऊ बना दिया गया है।

तलवे सहलाती पत्रकारिता

दूसरी ओर, खुद को पत्रकार कहने वाले अनेक लोग सत्ता और संस्थान प्रबंधन के तलवे सहलाने में मशगूल दिखाई देते हैं। प्रश्न पूछने की जगह प्रशंसा, पड़ताल की जगह प्रचार और निष्पक्षता की जगह निष्ठा का प्रदर्शन हो रहा है। स्टूडियो बहसें विचार-विमर्श का मंच नहीं, बल्कि पूर्वनिर्धारित एजेंडों का अखाड़ा बन चुकी हैं। एंकर की आवाज़ जितनी ऊँची, उतना बड़ा राष्ट्रवाद; जितनी तीखी भाषा, उतनी अधिक टीआरपी-यही नया गणित है।

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भ्रमित जनता, बिखरता भरोसा

इस पूरी तस्वीर में सबसे दयनीय स्थिति जनता की है। बेचारी जनता सच और झूठ के बीच अंतर करने में उलझी हुई है। उसे सूचना चाहिए, पर उसे भावनाओं का तूफ़ान मिलता है। उसे विश्लेषण चाहिए, पर उसे शोर मिलता है। उसे तथ्यों की ठोस जमीन चाहिए, पर उसके सामने विचारधाराओं का दलदल परोसा जाता है।

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सबसे चिंताजनक पहलू है-विश्वास का क्षरण। मीडिया पर जनता इसलिए भरोसा करती है क्योंकि वह मानती है कि वहाँ तथ्यों की निष्पक्ष जाँच होगी। लेकिन जब वही संस्थान आंतरिक रूप से पक्षपात, दबाव, एजेंडा या प्रबंधन-निर्देशित खबरों में उलझे मिलते हैं, तो सवाल उठता है: क्या हम खबर देख रहे हैं या तैयार की गई कथा?

संस्थागत पतन की जड़ें

यह स्थिति केवल पत्रकारों की व्यक्तिगत नैतिकता का प्रश्न नहीं है; यह संस्थागत ढाँचे का संकट है। जब मालिकाना हित, राजनीतिक समीकरण और विज्ञापन का दबाव संपादकीय स्वतंत्रता पर हावी हो जाए, तो ‘चाल-चरित्र’ शब्द केवल मुहावरा नहीं रह जाता, वह वास्तविकता बन जाता है। पत्रकारिता का धर्म ‘सत्ता से सवाल’ था, लेकिन आज कई मंचों पर ‘सत्ता का संरक्षण’ अधिक दिखता है।

आईना जब विकृत हो जाए

विडंबना यह है कि मीडिया स्वयं को समाज का आईना कहती है। पर यदि आईना ही विकृत हो जाए, तो समाज अपना चेहरा कैसे देखेगा? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मजबूती केवल संविधान से नहीं, बल्कि नैतिक साहस से आती है। जब मीडिया आत्मालोचना से भागती है, तो वह लोकतंत्र को कमजोर करती है।

उम्मीद की आख़िरी किरण

इस पूरे प्रकरण से एक सकारात्मक संभावना भी निकलती है-जनता अब अधिक सजग है। डिजिटल माध्यमों ने सूचना के प्रवाह को एकतरफा नहीं रहने दिया। अब प्रश्न पूछे जा रहे हैं, जवाब माँगे जा रहे हैं। यही लोकतंत्र की असली शक्ति है।

आत्ममंथन का समय

आवश्यकता है कि मीडिया संस्थान आत्ममंथन करें। संपादकीय स्वतंत्रता को वास्तविक अर्थों में स्थापित करें। आंतरिक पारदर्शिता बढ़ाएँ। पत्रकारों को कॉर्पोरेट और राजनीतिक दबाव से मुक्त वातावरण दें। और सबसे बढ़कर-सच को प्राथमिकता दें, भले वह असुविधाजनक हो।

मीडिया की विश्वसनीयता एक बार खो जाए, तो उसे पुनः अर्जित करना कठिन होता है। ‘न्यूज इंडिया’ से जुड़े वायरल दृश्य केवल एक चेतावनी हैं-यदि पत्रकारिता ने अपनी दिशा नहीं सुधारी, तो वह अपनी ही बनाई चकाचौंध में अंधी हो जाएगी।

इतिहास का कठोर फैसला

लोकतंत्र को एक मजबूत मीडिया चाहिए, न कि मुखर प्रवक्ता। समाज को एक सच्चा आईना चाहिए, न कि सजा-धजा भ्रम। समय आ गया है कि मीडिया अपने चाल-चरित्र को दुरुस्त करे-वरना इतिहास उसका कठोर मूल्यांकन करेगा।

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेय
आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।

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