चीन मसला: आखिर देश से क्या छिपा रही है भारत सरकार ?

दीपक सेन
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इस वक्त देश भक्त जनमानस के जहन में एक प्रश्न कौंध रहा है कि सरकार चीन मसले पर जनता से कुछ छिपा तो नहीं रही? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक वीडियो को चीन सब टाइटल के साथ दिखा रहा ​है। इस वीडियो में प्रधानमंत्री ने कहा है कि चीन ने भारत के किसी भी भाग पर कब्जा नहीं किया, जबकि विदेश मंत्रालय ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में साफ कहा कि चीन ने गलवान घाटी में प्रवेश किया और द्विपक्षीय संबंधों समझौते को तोड़ा।

इन विरोधीभाषी बयानों के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा स्पष्टीकरण जारी किया गया। प्रधानमंत्री राष्ट्र का प्रमुख होता है और देश का प्रतिनिधि होता है। प्रधानमंत्री के किसी भी बयान का सीधे रूप में अंतरराष्ट्रीय कुटनीति पर गलत प्रभाव पड़ सकता है।

चीन द्वारा गलवान घाटी में हमारे 20 सैनिकों की शहादत पर पुलवामा हमले की तरह भारत सरकार त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है? अभी तक गलवान घाटी में शहीद हुए 20 सैनिकों की फोटो को नाम के साथ क्यों नहीं जारी की गई? चीन के कब्जे में फंसे 10 सैनिकों की रिहाई की खबर भी अखबार के जरिये मिली। चीन के कब्जे वाले सैनिकों के मामले को सरकार ने क्यों सामने नहीं रखा?

पुलवामा हमले के वक्त तमाम मंत्री सहित स्वयं प्रधानमंत्री ने शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी। क्या गलवान घाटी में शहीद हुए जवानों को सरकार में बैठे महारथियों द्वारा श्रद्धांजलि नहीं दी जानी चाहिए थी?​

बिहार रेजीमेंट का जिक्र क्यों ?

प्रधानमंत्री ने 20 जून को वीडियों जारी किया जिसमें बिहार रेजीमेंट का जिक्र किया। इस वीडियो को बिहार चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। क्या प्रधानमंत्री बिहार चुनावों में 20 जवानों की शहादत का फायदा उठाना चाहते हैं?

चीन को लेकर दोहरा चरित्र!

भारतीय जनता में चीनी के सामान एवं ऐप को लेकर विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। मगर दूसरी तरफ अडानी, टाटा जैसे कई बड़े औद्योगिक घराने है, जो चीन की कंपनी के साथ करार को बरकरार रखे हुए हैं। यह दोहरा चरित्र समझ से परे है।

कोरोना से कई चीजें संभव नहीं हैं, लेकिन किसी भी तरह का करार देश से बढ़कर नहीं होता है। ऐसे में सरकार को चीन से तमाम तरह के आयात पर प्रतिबंध लगाना चाहिए और सभी तरह के करार रद्द करवाना चाहिए।

गौरतलब है कि अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में परमाणु परीक्षण के बाद अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध लगे थे। मगर अटल जी के कदम नहीं डगमगाये थे। उसके सामने तो यह कुछ भी नहीं है। वक्त आ गया है कि प्रधानमंत्री को देश के सामने आकर सीधी सपाट भाषा में पूरे मामले को स्पष्ट करना चाहिए और जनता के समक्ष भारत सरकार का पक्ष रखना चाहिए।

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मुख्य संपादक
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