औरंगाबादः रिश्तों की दुनिया जब स्वार्थ और औपचारिकताओं में उलझती जा रही है। रिश्तों की संवेदनाएं जब आधुनिक जीवन की आपाधापी में धुंधली पड़ती दिखती हैं, ऐसे समय में बिहार के औरंगाबाद जिले से सामने आई एक घटना ने इंसानी जज़्बातों और भाईचारे की गहराई को फिर से जीवंत कर दिया है। यहां जुड़वा दो भाइयों ने न सिर्फ एक साथ जन्म लिया, बल्कि एक ही दिन, लगभग एक ही समय में इस दुनिया को अलविदा भी कह दिया।
यह हृदयविदारक घटना कुटुंबा प्रखंड के चिल्हकी गांव की है। गांव के 90 वर्षीय जुड़वा भाई सुखलाल प्रजापति और मथुरा प्रजापति शुक्रवार को हमेशा के लिए एक-दूसरे के साथ हो गए। दोनों की मौत के बाद परंपरागत रीति-रिवाजों के तहत एक ही चिता पर उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर दिया।
बीमारी से मौत, और सदमे से विदाई
परिजनों के अनुसार, सुखलाल प्रजापति लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और बिस्तर पर ही थे। वहीं उनके जुड़वा भाई मथुरा प्रजापति उम्र के बावजूद चल-फिर रहे थे और उनकी देखभाल में लगे रहते थे। शुक्रवार की दोपहर जब सुखलाल ने अंतिम सांस ली, तो घर में शोक की लहर दौड़ गई।
परिवार अंतिम संस्कार की तैयारी कर ही रहा था कि अचानक मथुरा प्रजापति की तबीयत बिगड़ गई। बताया जाता है कि भाई के निधन का गहरा सदमा वे सह नहीं पाए। महज आधे घंटे के भीतर उन्होंने भी इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
गांव में शोक, लोगों की आंखें नम
दोनों भाइयों की एक साथ मौत की खबर आग की तरह पूरे गांव में फैल गई। अंतिम यात्रा के दौरान माहौल बेहद गमगीन था। ग्रामीणों का कहना है कि दोनों भाइयों के बीच बचपन से ही गहरा भावनात्मक जुड़ाव था। जीवन की हर परिस्थिति में वे एक-दूसरे का सहारा बने रहे।
एक ही चिता पर दो भाइयों को मुखाग्नि देने का दृश्य ऐसा था, जिसने रिश्तों की ताकत और इंसानी भावनाओं की गहराई को शब्दों से परे साबित कर दिया।
रिश्तों के मायने याद दिलाती कहानी
यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस आत्मीयता की मिसाल है, जो आज के दौर में कम देखने को मिलती है। सुखलाल और मथुरा प्रजापति की यह कहानी बताती है कि कुछ रिश्ते सिर्फ खून से नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु तक साथ निभाने की भावना से बंधे होते हैं।
औरंगाबाद के चिल्हकी गांव से निकली यह कहानी अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय है—एक ऐसी विदाई, जिसने समाज को रिश्तों के असली मायने याद दिला दिए।