Special Report: पिता की संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार देने का फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था का एक ऐतिहासिक और प्रगतिशील कदम माना जा रहा है। यह निर्णय संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को मजबूत करता है और उस पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देता है, जिसमें बेटियों को आज भी संपत्ति और उत्तराधिकार से वंचित रखा जाता रहा है।
हालांकि, कानून का उद्देश्य जितना न्यायपूर्ण है, उसका सामाजिक प्रभाव उतना ही जटिल और बहुआयामी भी है। सवाल सिर्फ अधिकार का नहीं, बल्कि व्यवहार, दुरुपयोग और सामाजिक संतुलन का भी है।
कानून का लाभ: बेटियों को कानूनी और आर्थिक सुरक्षा
इस कानून से बेटियों को स्पष्ट रूप से वे अधिकार मिलते हैं, जिनसे वे दशकों तक वंचित रहीं। यह फैसला लैंगिक समानता को मजबूती देता है। तलाक, वैवाहिक हिंसा या पारिवारिक उपेक्षा जैसी स्थितियों में बेटियों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। पुरुष-प्रधान संपत्ति व्यवस्था को तोड़ते हुए महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर देता है। न्याय के लिहाज़ से यह बदलाव आवश्यक और समयानुकूल है।
दहेज कानून: कागज़ों में सख्त, ज़मीन पर कमजोर
लेकिन भारतीय सामाजिक संरचना की सच्चाई इससे अलग है। बेटी की शादी आज भी पिता और भाई की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती है। एक पिता अपनी जीवनभर की कमाई, बचत और कई बार जमीन-जायदाद तक बेटी के विवाह में लगा देता है।
दहेज: अपराध होते हुए भी सामाजिक सच
दहेज कानूनन अपराध है—यह सर्वविदित तथ्य है। मगर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि दहेज के खिलाफ कानून बनाने वाले से लेकर उसे लागू करवाने वाली व्यवस्था तक, इससे पूरी तरह बच नहीं पाई है। देश की धरातली हकीकत यही है कि दहेज आज भी खुले या छिपे रूप में लिया और दिया जाता है।
दहेज और संपत्ति अधिकार: मायके पर दोहरी मार
यहीं से यह कानून एक नई बहस को जन्म देता है। शादी के समय पिता दहेज देकर आर्थिक रूप से टूट जाता है। शादी के बाद कई मामलों में ससुराल पक्ष कानून की आड़ लेकर बेटी पर दबाव बनाता है कि वह पिता की संपत्ति में अपने हिस्से का दावा करे। क्सर यह दावा बेटी की स्वेच्छा से नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक दबाव में किया जाता है। नतीजतन, एक ही परिवार (मायका) दो बार टूटता है— पहली बार दहेज के बोझ से और दूसरी बार संपत्ति के बंटवारे से।
कानून का दुरुपयोग: न्याय से वसूली तक
यहाँ कानून के दुरुपयोग का पहलू सबसे संवेदनशील बनकर सामने आता है।
- कुछ मामलों में यह कानून न्याय का माध्यम नहीं, बल्कि दबाव और वसूली का औज़ार बन जाता है।
- ससुराल पक्ष बेटियों को भावनात्मक रूप से बाध्य करता है कि वे मायके से संपत्ति या धन लेकर आएँ।
- लंबी कानूनी लड़ाइयाँ पूरे परिवार को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से तोड़ देती हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा पीड़ित वही पिता होता है, जिसने बेटी की शादी के लिए अपना सब कुछ कुर्बान किया होता है, और वही बेटी, जो अधिकार और मजबूरी के बीच पिसती रहती है।
बराबर अधिकार, तो बराबर दायित्व भी?
कानून के अमल में आने के बाद से अब तक ऐसे कई मामलों को क़रीब से देखने वाले सासाराम व्यवहार न्यायालय के वरीय अधिवक्ता धर्मेंद्र कुमार सिंह अधिकार और दायित्व पर एक बुनियादी और ज़रूरी सवाल उठाते हुए कहते हैं—
“यदि माता-पिता की संपत्ति में बेटियों का अधिकार बेटों के समान है, तो क्या उनके प्रति दायित्व भी समान नहीं होने चाहिए? जब बेटी को माता-पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार प्राप्त है, तो क्या वृद्धावस्था में उनकी देखभाल, भरण-पोषण, उपचार तथा ऋणों के भुगतान की जिम्मेदारी भी समान रूप से साझा नहीं की जानी चाहिए? क्या बेटे के साथ-साथ बेटी पर भी नैतिक, भावनात्मक और आर्थिक दायित्व नहीं बनते?”— धर्मेंद्र कुमार सिंह, वरीय अधिवक्ता
अधिवक्ता धर्मेंद्र कुमार सिंह का स्पष्ट मानना है कि अधिकार यदि जिम्मेदारी से कट जाए, तो वह न्याय नहीं, बल्कि असंतुलन पैदा करता है।
कानून के साथ सामाजिक विवेक अनिवार्य
बेटियों को संपत्ति में बराबर अधिकार मिलना चाहिए—इसमें कोई संदेह नहीं। यह अधिकार छीना नहीं जा सकता और न ही छीना जाना चाहिए। लेकिन जब तक दहेज जैसी कुप्रथा पर ईमानदारी से ज़मीनी स्तर पर रोक नहीं लगती, कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं बनते, और अधिकार के साथ दायित्व की सामाजिक स्वीकार्यता नहीं बनती, तब तक यह कानून कई परिवारों के लिए न्याय से अधिक संकट का कारण बनता रहेगा।
कानून तभी सच्चे अर्थों में न्यायपूर्ण कहलाएगा, जब वह अधिकार के साथ दायित्व, समानता के साथ संवेदनशीलता और शक्ति के साथ जिम्मेदारी—इन तीनों को समान महत्व देगा।
