Samridhi Yatra: यात्राएं होती रहीं, लोग देखते रहे, बिहार पूछता रहा – कब बदलेगी तस्वीर?

अभय पाण्डेय

पटनाः बिहार की राजनीति में यदि किसी एक शब्द ने सबसे लंबी उम्र पाई है, तो वह है — यात्रा। वर्ष 2005 में सत्ता संभालने के बाद से लेकर अब तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने न्याय यात्रा, विकास यात्रा, समाधान यात्रा, प्रगति यात्रा, महिला संवाद यात्रा को मिलाकर अब तक कुल 15 बड़ी राज्य-स्तरीय यात्राएं की हैं। 16 जनवरी से वे पुनः अपनी 16वीं यात्रा ‘समृद्धि यात्रा’ (Samridhi Yatra) पर हैं।

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हर यात्रा के साथ एक ही दावा किया गया — जनता से सीधा संवाद, योजनाओं की समीक्षा और विकास को नई गति, लेकिन लगभग 20 वर्षों के शासन के बाद भी बिहार आज उसी सवाल पर आकर ठहर जाता है — क्या यात्राओं से तस्वीर बदली या सिर्फ यात्राओं की तस्वीरें बदलीं?

सत्ता में रहते हुए यात्रा: प्रयोग या मजबूरी?

नीतीश कुमार की यात्राएं भारतीय राजनीति में एक अलग प्रयोग मानी गईं, क्योंकि ये यात्राएं विपक्ष में नहीं, बल्कि सत्ता में रहते हुए की गईं। शुरुआती दौर में इसे एक सकारात्मक पहल माना गया — मुख्यमंत्री खुद गांव-गांव जाकर हालात देख रहे हैं, लेकिन समय के साथ यह प्रयोग एक स्थायी आदत में बदल गया।

अगर हर कुछ वर्षों में मुख्यमंत्री को खुद यह देखने निकलना पड़े कि सड़क बनी या नहीं, अस्पताल में डॉक्टर हैं या नहीं, स्कूल चल रहे हैं या नहीं, तो सवाल उठता है — फिर शासन व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र किस काम के लिए है?

विकास के दावे बनाम जमीनी सच्चाई

यात्राओं के मंच से विकास की लंबी सूची गिनाई जाती रही — सड़क, बिजली, नल-जल, शौचालय, महिला सशक्तिकरण, लेकिन जमीनी स्तर पर बिहार आज भी उन समस्याओं से जूझ रहा है—

  • पलायन अब भी बिहार की सबसे बड़ी पहचान बना हुआ है
  • बेरोजगारी युवाओं की सबसे बड़ी चिंता है
  • उद्योग और निजी निवेश की भारी कमी है
  • शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं
  • कानून-व्यवस्था को लेकर बार-बार बहस होती रही है

कई यात्राओं के दौरान विरोध, हंगामा और नाराज़गी यह संकेत देती रही कि जनता के अनुभव और सरकार के दावों के बीच दूरी बनी हुई है।

यात्राएं शासन का विकल्प नहीं हो सकतीं

यात्राएं शासन का विकल्प नहीं हो सकतीं। वे अधिकतम एक अस्थायी समीक्षा उपकरण हो सकती हैं। 20 साल बाद भी अगर वही समस्याएं बार-बार सामने आ रही हैं, तो दोष जनता का नहीं, नीतियों और क्रियान्वयन की विफलता का है।

यह बात अलग है कि यात्राओं ने उम्मीद तो जगाई, लेकिन समय के साथ वही उम्मीद थकान और सवाल में बदल गई।

विपक्ष के सवाल: सिर्फ राजनीति नहीं, जनभावना की आवाज़

विपक्षी दलों ने नीतीश कुमार की यात्राओं को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं। तेजस्वी यादव ने प्रगति यात्रा को दुर्गति यात्रा” बताया और कहा कि सरकार यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, जबकि बिहार का युवा आज भी नौकरी के लिए राज्य से बाहर जाने को मजबूर है।

राजद और कांग्रेस का तर्क है कि अगर 20 साल की सत्ता के बाद भी मुख्यमंत्री को यात्रा करनी पड़ रही है, तो यह उपलब्धि नहीं, बल्कि शासन की सीमा है।

राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने समाधान यात्रा को समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि समस्याओं का प्रदर्शन करार दिया।
लालू प्रसाद यादव समेत अन्य नेताओं ने भी इन अभियानों को दिखावटी प्रयास बताया। ये आलोचनाएं इसलिए असर करती हैं, क्योंकि वे आम आदमी के अनुभव से मेल खाती हैं।

सरकार का पक्ष: यात्रा से ही जवाबदेही

सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन का कहना है कि यात्राओं के कारण ही अफसरों की जवाबदेही तय हुई, योजनाओं की निगरानी संभव हुई जिससे पंचायत व जिला स्तर पर प्रशासन सक्रिय हुआ। सरकार का दावा है कि अगर यात्राएं न होतीं, तो कई योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित रह जातीं।

आज क्या चाहता है बिहार?

राजनीतिक बयानबाज़ी से परे, बिहार की जनता के सवाल बेहद सीधे हैं —

  • युवा पूछता है — रोजगार कब मिलेगा?
  • किसान पूछता है — आमदनी कब बढ़ेगी?
  • मजदूर पूछता है — पलायन से मुक्ति कब मिलेगी?

अब जनता को घोषणाएं नहीं, निरीक्षण नहीं, यात्राएं नहीं — ठोस परिणाम चाहिए।

यात्राएं बहुत हुई, मंज़िल अभी तक बाकी है

कुल मिलाकर नीतीश कुमार की यात्राएं बिहार की राजनीति का एक अहम अध्याय हैं। उन्होंने संवाद किया, घूम-घूमकर देखा — यह सच है, लेकिन इतिहास संवाद नहीं, परिणाम याद रखता है। आज बिहार देखते-देखते थक चुका है। अब वह पूछ रहा है — यात्राएं होती रहीं, लोग देखते रहे — अब बिहार पूछता है, कब बदलेगी तस्वीर?

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आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।