पटनाः डिजिटल मीडिया के दौर में जब किसी चर्चित चेहरे के संस्थान छोड़ने की खबर आती है, तो उसे सामान्य पेशेवर बदलाव की बजाय “भूकंप” की तरह पेश किया जाने लगता है। हालिया उदाहरण सौरभ द्विवेदी का लल्लनटॉप से अलग (Saurabh Dwivedi resigns from Lallantop) होना है। सोशल मीडिया पर बहस है—अब द लल्लनटॉप ( The Lallantop) का क्या होगा? क्या उसकी पहचान खतरे में पड़ जाएगी? लेकिन अगर ज़रा ठहरकर देखा जाए, तो यह सवाल उतना नया नहीं है, जितना उसे बनाया जा रहा है।
नौकरी नहीं, यात्रा है पत्रकारिता
मीडिया संस्थान हो या कोई अन्य प्राइवेट नौकरी —कर्मचारियों का आना-जाना एक सतत प्रक्रिया है। कोई पत्रकार संस्थान को छोड़ता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि न संस्थान खत्म हो जाता है और न ही पत्रकार की पहचान। पत्रकारिता दरअसल किसी कुर्सी या लोगो की मोहताज नहीं होती, बल्कि सोच, भाषा और दृष्टि की निरंतरता से चलती है।
सौरभ द्विवेदी भी लल्लनटॉप के पहले ऐसे पत्रकार नहीं हैं, जिन्होंने उस मंच को छोड़ा हो। उनसे पहले अभिनव पाण्डेय ने भी लल्लनटॉप को अलविदा कहा था। लेकिन न लल्लनटॉप बंद हुआ और न अभिनव की पत्रकारिता ठहरी। आज वे न्यूज़ पिंच के माध्यम से उसी ठसक और साफ़गोई के साथ दर्शकों के सामने मौजूद हैं, जिसके लिए वे पहचाने जाते रहे हैं।
संस्थान पहचान देता है या पत्रकार?
यह बहस नई नहीं है। भारतीय मीडिया में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहाँ पत्रकारों ने अपनी मेहनत, भाषा और सोच से किसी संस्थान को पहचान दी, फिर समय आने पर उसे छोड़कर नई जगह उसी पहचान को और मजबूत किया। जवाब साफ़ है—पहचान हमेशा काम से बनती है, कुर्सी से नहीं।
संस्थान मंच देता है, पहचान खुद गढ़ता है पत्रकार
- रवीश कुमार लंबे समय तक NDTV का चेहरा रहे। संस्थान से अलग होने के बाद भी उनकी पत्रकारिता, विचार और दर्शक—तीनों उनके साथ बने रहे।
- पुण्य प्रसून वाजपेयी ने Aaj Tak, Zee News, Sahar Samay, ABP News और अन्य चैनलों में अपनी शैली से अलग पहचान बनाई। संस्थान बदले, लेकिन पत्रकारिता की धार नहीं बदली।
- अजीत अंजुम Amar Ujala, Aaj Tak, Star News (ABP), News 24, Tv9 Bharatvarsh और India TV जैसे बड़े प्लेटफॉर्म से निकलकर डिजिटल माध्यम में आए और आज स्वतंत्र पत्रकारिता की एक अलग मिसाल हैं।
- श्रीकांत प्रत्युष ने Zee News की स्थापना से लेकर वर्षों तक बिहार–झारखंड में उसकी साख गढ़ी और PTN के माध्यम से कई पत्रकार तैयार किए। आज उनके सिखाए चेहरे देश के बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर रहे हैं।नौकरी छोड़कर उन्होंने City Post Live शुरू किया और यह दिखाया कि संस्थान बदलने से पत्रकारिता नहीं रुकती—वह सिर्फ नया मंच चुनती है।
इनके अलावें बरखा दत्त, विनोद कापड़ी, अभिसार शर्मा, अभिरंजन कुमार, अभिषेक उपाध्याय, साक्षी जोशी, नवीन कुमार जैसे कई और बड़े नाम भी हैं, जिन्होंने संस्थान छोड़े, लेकिन अपनी पत्रकारिता जारी रखी और काम के बदौलत नई जगह फिर से अपनी पहचान बनाई। इन उदाहरणों से साफ है—संस्थान मंच देता है, पहचान पत्रकार खुद गढ़ता है।
संस्थान भी चलता है, पत्रकार भी
यह मानना भ्रम है कि कोई संस्थान किसी एक व्यक्ति के जाने से खत्म हो जाएगा। उसी तरह यह मानना भी गलत है कि बिना बड़े संस्थान के कोई पत्रकार अप्रासंगिक हो जाएगा। मीडिया का इतिहास बताता है कि संस्थान चलते रहते हैं, चेहरे बदलते रहते हैं, और पत्रकार अपनी यात्रा आगे बढ़ाते रहते हैं।
मीडिया को आत्ममंथन की ज़रूरत
असल चिंता यह होनी चाहिए कि क्या संस्थान अपने मूल्यों और कंटेंट की गुणवत्ता को बनाए रख पाएगा। लेकिन सोशल मीडिया बहस वहां नहीं जाती। वहां तो सवाल व्यक्ति-केंद्रित होते हैं—कौन गया, क्यों गया, किससे झगड़ा हुआ। यह सोच मीडिया को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर करती है।
सोशल मीडिया की अतिशयोक्ति
आज समस्या यह है कि हर पेशेवर फैसले को “ब्रेकिंग” और “संस्थान संकट” बना दिया जाता है। सौरभ द्विवेदी का लल्लनटॉप छोड़ना भी एक करियर निर्णय है—न इससे पत्रकारिता खत्म होती है, न लल्लनटॉप की कहानी।
पत्रकार और संस्थान का रिश्ता
कुल मिलाकर पत्रकार और संस्थान का रिश्ता सहयात्रा का होता है, स्थायी बंधन का नहीं। जो पत्रकार अपनी मेहनत से किसी मंच को पहचान देता है, वह नई जगह जाकर भी उसी पहचान को आगे बढ़ाता है। और जो संस्थान स्वस्थ हैं, वे बदलाव के बावजूद आगे बढ़ते रहते हैं।
असली सवाल यह नहीं कि “कौन गया”, बल्कि यह है कि “काम की गुणवत्ता बनी रहेगी या नहीं”—बाकी सब शोर है।