अभय वाणीः बिहार की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहाँ सत्ता की गणित और जनता के जनादेश के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है। नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं और उनकी जगह किसी दूसरे नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा-संभावना है कि वह चेहरा बीजेपी का होगा। यदि ऐसा होता है, तो एक ओर नीतीश कुमार का नाम बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता के रूप में दर्ज हो जाएगा, लेकिन दूसरी ओर एक बड़ा और असहज सवाल खड़ा होगा-जिसे जनता ने चुना, उसकी जगह कोई दूसरा क्यों?
जनादेश और नेतृत्व का सवाल
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि सत्ता जनता की इच्छा से संचालित होती है। बिहार की जनता ने जब-जब मतदान किया, तो उसके सामने नेतृत्व के केंद्र में नीतीश कुमार ही रहे। चुनावी प्रचार से लेकर राजनीतिक विमर्श तक, सब कुछ उनके नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमता रहा। ऐसे में अगर चुनाव के बाद नेतृत्व अचानक बदल दिया जाता है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या जनता का जनादेश केवल एक राजनीतिक औपचारिकता बनकर रह गया है?
चेहरा बदलने पर उठती नैतिक बहस
भारतीय राजनीति में यह पहली घटना नहीं होगी। कई बार ऐसा हुआ है कि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री का चेहरा बदल दिया गया। लेकिन हर बार यह बहस जरूर उठी कि क्या यह लोकतांत्रिक नैतिकता के अनुरूप है। चुनाव के दौरान जनता जिस चेहरे पर भरोसा करती है, वह केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक प्रतीक बन जाता है-नीतियों, वादों और राजनीतिक दिशा का प्रतीक। उस प्रतीक को अचानक बदल देना जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है।
बिहार की राजनीति का बड़ा मोड़
बिहार के संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। पिछले दो दशकों में राज्य की राजनीति का बड़ा हिस्सा नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। चाहे विकास की राजनीति हो, सुशासन की चर्चा हो या गठबंधन की जटिलता-हर बहस के केंद्र में वही रहे। ऐसे में अगर उन्हें राज्यसभा भेजकर सत्ता की बागडोर किसी दूसरे को सौंप दी जाती है, तो यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि बिहार की राजनीतिक कथा में एक बड़ा मोड़ होगा।
कानून बनाम राजनीतिक नैतिकता
यह भी सच है कि संसदीय लोकतंत्र में सरकार दल या गठबंधन चलाता है, कोई एक व्यक्ति नहीं। संविधान के अनुसार विधायक दल जिस नेता को चुनता है वही मुख्यमंत्री बन सकता है। इसलिए कानूनी दृष्टि से इसमें कोई बाधा नहीं है। लेकिन राजनीति केवल कानून से नहीं चलती, वह नैतिकता और जनभावना से भी संचालित होती है। यही वह बिंदु है जहाँ यह निर्णय बहस का विषय बन सकता है।
नई सरकार की चुनौती
अगर भाजपा का कोई नेता मुख्यमंत्री बनता है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह जनता को यह भरोसा दिला सके कि यह बदलाव सत्ता की सुविधा के लिए नहीं बल्कि राज्य के हित में है। अन्यथा विपक्ष के लिए यह मुद्दा तैयार रहेगा कि जनता ने जिस नेतृत्व को चुना था, उसे बीच रास्ते में बदल दिया गया।
जनता के भरोसे की कसौटी
आखिरकार लोकतंत्र की असली ताकत चुनाव के दिन से आगे भी जारी रहती है। जनता सिर्फ वोट नहीं देती, वह भरोसा भी देती है। और राजनीति की असली कसौटी यही है कि उस भरोसे को कितना सम्मान दिया जाता है।
Read also: किस रूप में याद किए जाएंगे नीतीश कुमार – अनुभवी प्रशासक या हास्य कलाकार?
इसलिए यदि बिहार में यह परिवर्तन होता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक या राजनीतिक फेरबदल नहीं होगा। यह लोकतांत्रिक नैतिकता की उस बहस को फिर से जीवित कर देगा, जो बार-बार पूछती है-क्या सत्ता का गणित जनादेश की भावना से बड़ा हो सकता है?
Read also: नीतीश की सेहत पर सवाल, भाजपा ने की शुरुआत अब राजद हमलावर
