पटनाः बिहार सरकार का दावा है कि ‘हर घर नल का जल’ योजना के तहत हर घर तक नल पहुँच गया है। टंकियाँ खड़ी हो गईं, पाइपलाइनें बिछ गईं, उद्घाटन पट्टिकाएँ लग गईं। आँकड़े बताते हैं कि लगभग हर घर तक कनेक्शन दे दिया गया है।
कागज़ पर यह एक बड़ी प्रशासनिक उपलब्धि है। लेकिन जमीनी सवाल अलग है-क्या हर घर तक रोज़, पर्याप्त और सुरक्षित पानी पहुँच रहा है या पहुंच सकेगा? इसका जवाब लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) को देना है, जिसकी कमान फिलहाल मंत्री संजय सिंह के हाथ में है।
कवरेज की तस्वीर और विस्तार
सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में लगभग 99.20% घरों तक नल के माध्यम से पानी की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। शिकायत निवारण प्रणाली में दर्ज मामलों में से लगभग 98% हल किए जाने का दावा किया गया है।
अब नए घर और पिछड़े टोलों पर फोकस
राज्य में अगले महीने तक लगभग 26 लाख नए घरों में पेयजल की आपूर्ति शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। लोक स्वास्थ्य एवं अभियंत्रण विभाग लगातार इस योजना की प्रगति पर निगरानी रख रहा है। PHED के मुताबिक राज्य के लगभग 27,000 टोले अब योजना में शामिल किए जा रहे हैं। इनमें मुख्यतः वे टोले शामिल हैं जो गाँव की मुख्य आबादी से कुछ दूरी पर स्थित हैं, या नए बसावट वाले इलाके हैं, जहां अब तक योजना का लाभ नहीं पहुँच पाया था।
पहली नजर में ये आंकड़े योजना की व्यापक सफलता का संकेत देते हैं, लेकिन केवल कनेक्शन होने का मतलब यह नहीं कि हर घर नियमित, पर्याप्त और सुरक्षित पानी पा रहा है या आगे चलकर पा सकेगा।
सेवा की नियमितता और वास्तविकता
सरकारी अध्ययन में ग्रामीण इलाकों में 94% परिवारों के पास नल कनेक्शन बताया गया है। इनमें से लगभग 93.8% परिवारों को प्रतिदिन 70 लीटर प्रति व्यक्ति पानी मिलने का दावा किया गया है, और 92.73% परिवारों को रोज़ाना कम से कम छह घंटे जलापूर्ति का दावा है। लेकिन कई इलाकों में जमीनी हकीकत कुछ और है। जहां- पाइपलाइन का दबाव कम होना, बार-बार फेल होना, टंकी और वाल्व की मरम्मत में देरी और बिजली कटौती के कारण सप्लाई ठप होने जैसी शिकायतें आम हैं। इसका मतलब यह है कि कवरेज की संख्या और वास्तविक सेवा में स्थिरता के बीच बड़ा अंतर है।
भूजल गुणवत्ता – स्वास्थ्य के लिए खतरा
राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में पाया गया कि 30,207 ग्रामीण वार्डों में भूजल गुणवत्ता प्रभावित है। इनमें- 4709 वार्ड आर्सेनिक प्रभावित, 3789 वार्ड फ्लोराइड प्रभावित और 21709 वार्ड आयरन की अधिकता से प्रभावित हैं।
यह स्थिति दर्शाती है कि पाइपलाइन के माध्यम से पानी पहुंचाने के बावजूद, स्रोत का जल स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। जल गुणवत्ता की नियमित जांच, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और सुधारात्मक कार्रवाई अनिवार्य है।
ठेकेदारी मॉडल और निगरानी
बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य ठेकेदारी मॉडल के तहत हुआ। पाइपलाइन बिछाने, जलमीनार निर्माण और मोटर स्थापना के काम निजी ठेकेदारों द्वारा कराए गए।
यदि कुछ ही वर्षों में मोटर फेल हो रही है, पाइपलाइन टूट रही है या संरचनाओं में दरारें दिख रही हैं, तो यह निर्माण मानकों और PHED की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
महत्वपूर्ण सवाल हैं- दोषपूर्ण निर्माण पर कितनी कार्रवाई हुई? कितने ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया गया? कितने मामलों में वित्तीय दंड लगाया गया? क्या यह जानकारी जनता के लिए उपलब्ध है? निर्माण और निगरानी की पारदर्शिता के बिना योजना की स्थिरता और विश्वसनीयता संदिग्ध बनी रहती है।
जवाबदेही और सार्वजनिक विश्वास
मंत्री संजय सिंह और PHED के सामने चुनौती सिर्फ कवरेज बढ़ाना नहीं है। असली परीक्षा है- प्रत्येक घर तक नियमित और पर्याप्त पानी पहुँच रहा है या नहीं, जल की गुणवत्ता सुरक्षित है या नहीं, शिकायत समाधान और मरम्मत प्रक्रिया समय पर हो रही है या नहीं, निर्माण गुणवत्ता और ठेकेदारी मॉडल की निगरानी पूरी तरह पारदर्शी है या नहीं। इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि योजना कितनी प्रभावी है।
आंकड़ों के पीछे वास्तविकता
‘हर घर नल का जल’ ने बिहार में बड़े पैमाने पर भौतिक विस्तार किया है। करोड़ों परिवार पाइपलाइन से जुड़े हैं। लेकिन भूजल प्रदूषण, अनियमित सप्लाई, रखरखाव की देरी और ठेकेदारी मॉडल की निगरानी की चुनौतियां यह संकेत देती हैं कि सिर्फ कनेक्शन होना ही सफलता नहीं है।
अब असली सवाल यही है-क्या हर घर का नल वास्तव में हर दिन सुरक्षित, पर्याप्त और भरोसेमंद पानी दे रहा है? यदि इसका जवाब सकारात्मक नहीं है, तो यह केवल तकनीकी कमी नहीं, बल्कि नीतिगत और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन जाता है। PHED मंत्री संजय सिंह के लिए यही असली कसौटी है।
