जहां चुनाव, वहीं ED? दिल्ली, झारखंड, बिहार के बाद अब बंगाल में छापे

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नई दिल्लीः देश की राजनीति में एक सवाल अब फुसफुसाहट नहीं, खुली बहस बन चुका है-क्या प्रवर्तन निदेशालय की सक्रियता का सीधा संबंध चुनावी कैलेंडर से जुड़ गया है? दिल्ली, झारखंड, बिहार और अब पश्चिम बंगाल (ED Raid in Bengal)। हर उस राज्य में, जहां चुनाव या चुनावी माहौल करीब आता दिखता है, वहीं ईडी (ED) की कार्रवाई भी तेज होती नजर आती है। विपक्ष इसे सत्ता का दबाव और राजनीतिक हथियार बता रहा है, जबकि सरकार हर बार इसे कानून की सामान्य प्रक्रिया करार देती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बार-बार बन रहा यह पैटर्न सिर्फ संयोग है?

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ईडी का काम और विवाद की शुरुआत

प्रवर्तन निदेशालय (ED) देश की केंद्रीय जांच एजेंसी है, जो मनी लॉन्ड्रिंग और आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों की जांच करती है। एजेंसी के पास कानूनी अधिकार हैं और कार्रवाई अदालतों के दायरे में होती है। विवाद जांच को लेकर नहीं, बल्कि उसके समय और दायरे को लेकर खड़ा होता है। कोलकाता में आज जो हुआ, उसने बहस को और तेज कर दिया।

जब सर्च ऑपरेशन के बीच खुद मौके पर पहुंचीं ममता बनर्जी

आज कोलकाता में उस वक्त राजनीतिक हलचल तेज हो गई जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद उस जगह पहुंच गईं, जहां ईडी सर्च ऑपरेशन चला रही थी। आम तौर पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई से राजनीतिक नेतृत्व दूरी बनाए रखता है, लेकिन ममता बनर्जी का सीधे मौके पर पहुंचना असाधारण कदम माना जा रहा है।

ममता के आरोपों ने बढ़ाई सियासी गर्मी

सर्च के बाद बाहर आकर ममता बनर्जी ने गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना था कि छापे के नाम पर तृणमूल कांग्रेस से जुड़े दस्तावेज़, सर्वे रिपोर्ट और उम्मीदवारों से संबंधित जानकारियां जुटाने की कोशिश की गई। ममता ने साफ कहा कि यह कार्रवाई किसी आर्थिक अपराध से ज्यादा पार्टी की चुनावी रणनीति तक पहुंचने की कोशिश लगती है, जिसे वह किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देंगी।

बंगाल में कहां-कहां हुई ईडी की रेड

बंगाल में ईडी की यह कार्रवाई कोलकाता के साल्ट लेक इलाके में स्थित इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC) के कार्यालय और उससे जुड़े व्यक्तियों के ठिकानों पर की गई। ईडी की टीम ने I-PAC से जुड़े कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों और रणनीतिक सलाहकारों के परिसरों में सर्च ऑपरेशन चलाया। एजेंसी का कहना है कि यह छापेमारी कथित आर्थिक लेन-देन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों की जांच का हिस्सा है। वहीं तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि जिन लोगों के यहां रेड हुई, वे पार्टी की चुनावी रणनीति और संगठनात्मक कामकाज से सीधे जुड़े हुए हैं, इसी वजह से यह कार्रवाई चुनावी हस्तक्षेप के तौर पर देखी जा रही है।

ईडी का जवाब बनाम ममता का सवाल

ईडी ने इन आरोपों से इनकार किया है। एजेंसी का कहना है कि जांच किसी राजनीतिक दल को निशाना बनाकर नहीं की जा रही और जो भी दस्तावेज़ मांगे गए, वे जांच से जुड़े थे। हालांकि ममता बनर्जी का तर्क है कि जिन लोगों के यहां छापेमारी हुई, वे उनकी पार्टी की चुनावी मशीनरी से सीधे जुड़े हुए हैं, ऐसे में निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

बिहार में शांति, बंगाल में अचानक सक्रियता

ममता बनर्जी ने परोक्ष रूप से एक और बड़ा सवाल खड़ा किया। उनका कहना है कि बिहार में लंबे समय तक ईडी शांत रही, लेकिन जैसे ही पश्चिम बंगाल में चुनाव नजदीक आए, एजेंसी की सक्रियता अचानक बढ़ गई। यही वह बिंदु है, जहां से विपक्ष का आरोप और मजबूत होता है कि जांच एजेंसियों की टाइमिंग राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से तय हो रही है।

दिल्ली और झारखंड की याद दिलाती कार्रवाई

इससे पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेताओं पर हुई कार्रवाई और झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत शोरेन से जुड़े मामलों में ईडी की सक्रियता ने भी यही सवाल उठाए थे। दोनों ही मामलों में कार्रवाई ऐसे समय सामने आई, जब राजनीतिक माहौल बेहद संवेदनशील था और सत्ता संतुलन दांव पर था।

विपक्ष का आरोप: जांच नहीं, दबाव की राजनीति

विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव से ठीक पहले जांच एजेंसियों की कार्रवाई का मकसद दोष सिद्ध करना नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देना होता है। आरोप यह भी है कि सत्ताधारी दल से जुड़े मामलों में वही सख्ती और तेजी देखने को नहीं मिलती।

सरकार का जवाब: कानून को राजनीति से न जोड़ें

केंद्र सरकार का पक्ष इससे अलग है। सरकार का कहना है कि ईडी स्वतंत्र एजेंसी है और उसका काम सबूतों के आधार पर कार्रवाई करना है। सरकार बार-बार यह दोहराती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को चुनाव से जोड़कर देखना गलत है।

असल सवाल: कार्रवाई नहीं, भरोसा

विशेषज्ञों की राय में समस्या ED की कार्रवाई से ज्यादा जनता के भरोसे की है। जब जांच वर्षों तक ठंडी पड़ी रहे और चुनाव के आसपास अचानक तेज हो जाए, तो शक पैदा होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में संस्थाओं की निष्पक्षता केवल होनी ही नहीं चाहिए, दिखनी भी चाहिए।

सवाल लाजिमी है-आखिर देश में चल क्या रहा है?

देश में यह बहस अब किसी एक राज्य या एक नेता तक सीमित नहीं रही। सवाल जांच एजेंसियों की भूमिका, उनकी स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संतुलन से जुड़ा है। सरकार के लिए चुनौती है पारदर्शिता बनाए रखने की, विपक्ष के लिए चुनौती है आरोपों को ठोस तथ्यों से जोड़ने की। क्योंकि आखिर में जवाब किसी एजेंसी या राजनीतिक दल को नहीं, बल्कि देश की जनता को चाहिए। और जनता यही जानना चाहती है-जहां चुनाव, वहीं ईडी… आखिर देश में चल क्या रहा है?

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