अभय वाणीः राजनीति में नारे अक्सर उम्मीदें जगाते हैं, लेकिन कभी-कभी वही नारे बहुत जल्दी अपनी चमक खो देते हैं। बिहार में NDA का चुनावी नारा-“25 से 30 फिर से नीतीश”-भी अब कुछ ऐसा ही प्रतीत होने लगा है। जिस नारे के साथ NDA ने बिहार में स्थिर नेतृत्व और मजबूत सरकार का संदेश दिया था, वह छह महीने के भीतर ही सवालों के घेरे में आ खड़ा हुआ है।
नेतृत्व के वादे पर सवाल
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संभावित राज्यसभा जाने की चर्चा ने इस नारे की विश्वसनीयता पर नया सवाल खड़ा कर दिया है। जिस नेतृत्व को बिहार की राजनीति का केंद्र बनाकर NDA द्वारा जनता से समर्थन मांगा गया, अगर वही नेतृत्व अचानक विधानसभा की राजनीति से हटकर राज्यसभा का रास्ता चुनता दिखे, तो यह स्वाभाविक है कि लोग पूछें-“फिर से नीतीश” का असली अर्थ क्या था?
गठबंधन के भीतर दबाव की आहट
राजनीतिक गलियारों में तो यहां तक चर्चा है कि यह फैसला केवल नीतीश का व्यक्तिगत नहीं हो सकता। एनडीए के भीतर बदलते शक्ति संतुलन और आंतरिक दबाव भी इसके पीछे एक कारक हो सकते हैं। गठबंधन की राजनीति में अक्सर ऐसे क्षण आते हैं जब औपचारिक फैसलों के पीछे अनौपचारिक समीकरण काम करते हैं। यदि राज्यसभा का रास्ता नीतीश कुमार के लिए खोला जा रहा है, तो यह भी संभव है कि बिहार की सत्ता संरचना को नए सिरे से संतुलित करने की कोशिश हो रही हो।
जनता के मन में उठते सवाल
कहा जा रहा है कि राज्यसभा जाने का निर्णय नीतीश कुमार का अपना है और उन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं है। लेकिन बिहार की जनता अचानक सामने आए इस फैसले से भौचक है। बहुत से लोगों को यह यकीन करना मुश्किल लग रहा है कि नीतीश कुमार जैसा अनुभवी नेता इतना बड़ा राजनीतिक निर्णय अचानक और पूरी तरह निजी पहल पर ले सकता है। जनचर्चा में यह धारणा भी सुनाई देती है कि इसके पीछे कहीं न कहीं कोई राजनीतिक मजबूरी या दबाव अवश्य रहा होगा।
पहले से जताया गया था अंदेशा
दिलचस्प बात यह है कि चुनाव से पहले ही इस तरह की आशंका की ओर संकेत किया गया था। जन सुराज अभियान सुत्रधार प्रशांत किशोर ने उस समय कहा था कि चुनाव के बाद बिहार की राजनीति में नेतृत्व को लेकर नई स्थिति बन सकती है और संभव है कि नीतीश कुमार सक्रिय राज्य राजनीति से अलग भूमिका में दिखें। उस समय इसे राजनीतिक बयानबाजी मानकर खारिज कर दिया गया था, लेकिन आज जब राज्यसभा जाने की चर्चा तेज है, तो वह अंदेशा फिर से याद आने लगा है।
नारे और वास्तविक राजनीति का फासला
यह संकेत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव के समय दिया गया नारा केवल सीटों का गणित नहीं था, बल्कि नेतृत्व की निरंतरता का वादा भी था। अगर छह महीने के भीतर ही सत्ता के समीकरण बदलने लगें और नेतृत्व की भूमिका को नए ढंग से परिभाषित करने की नौबत आए, तो यह स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करता है कि क्या चुनावी कथा और वास्तविक राजनीति के बीच दूरी बढ़ रही है।
विश्वास की असली कसौटी
बिहार की राजनीति पहले ही अस्थिर गठबंधनों और बदलते समीकरणों से थकी हुई है। ऐसे में अगर यह धारणा बनती है कि सत्ता के भीतर ही दबाव और पुनर्संतुलन की प्रक्रिया चल रही है, तो इससे सरकार की राजनीतिक छवि प्रभावित होना तय है। विपक्ष के लिए यह हमला बोलने का मौका होगा, जबकि समर्थकों के लिए यह असहज सवालों की वजह बन सकता है।
नारे की परिणति
अंततः राजनीति में नारे सिर्फ शब्द नहीं होते, वे भरोसे का प्रतीक होते हैं। “25 से 30 फिर से नीतीश” भी ऐसा ही एक भरोसा था। लेकिन अगर परिस्थितियाँ इस तरह बदलती दिखें कि वही नेतृत्व राज्य की प्रत्यक्ष राजनीति से दूरी बनाता नजर आए-और उसके पीछे गठबंधन की आंतरिक राजनीति की आहट सुनाई दे तो यह कहना गलत नहीं होगा कि यह नारा भी शायद बहुत जल्दी “टांय-टांय फिस” होता नजर आ रहा है।
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