दही-चूड़ा भोज में सियासी मिठास: मकर संक्रांति पर बिहार का राजनीतिक उत्तरायण

अभय पाण्डेय

पटनाः मकर संक्रांति आते ही बिहार की राजनीति भी सूर्य की तरह उत्तरायण हो जाती है। आंगन में चूल्हा सुलगता है, थालियों में दही-चूड़ा सजता है और सियासी दरबारों में मुलाक़ातों, संदेशों और समीकरणों की आँच तेज़ हो जाती है। लोकपर्व की सादगी के बीच सत्ता की राजनीति अपने सबसे आत्मीय रंग में दिखती है—जहाँ चुनावी रणनीति, सामाजिक संदेश और मेल-मिलाप एक ही थाली में परोसे जाते हैं।

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दही-चूड़ा: परंपरा से राजनीतिक प्रतीक तक

बिहार में दही-चूड़ा केवल भोजन नहीं, सांस्कृतिक पहचान है। मकर संक्रांति पर यही व्यंजन नेताओं के लिए जन-संपर्क और सियासी संदेश का माध्यम बन जाता है। मुख्यमंत्री आवास से लेकर पार्टी कार्यालयों और निजी आवासों तक, दावतों की लंबी श्रृंखला शुरू हो जाती है। तस्वीरें, वीडियो और आमंत्रण-सूची अपने-आप में राजनीतिक संकेत देने लगती हैं।

NDA की थाली: सत्ता, स्थिरता और सामंजस्य

सत्तारूढ़ एनडीए  खेमे में मकर संक्रांति का दही-चूड़ा भोज शक्ति-प्रदर्शन के साथ सामंजस्य का संदेश देता है। भाजपा, जदयू, लोजपा (रामविलास), हम (सेक्युलर) और आरएलएम जैसे घटक दलों के नेताओं के यहाँ आयोजित भोज सत्ता की साझा तस्वीर पेश करते हैं। मुख्यमंत्री आवास पर होने वाला पारंपरिक दही-चूड़ा भोज हो या फिर भाजपा और जदयू के वरिष्ठ नेताओं के निजी निमंत्रण—हर जगह यह संदेश साफ रहता है कि गठबंधन एकजुट है और परंपरा के साथ सत्ता भी सुरक्षित।

NDA नेताओं के भोज में अक्सर संगठनात्मक मजबूती, आगामी चुनावी तैयारियों और सामाजिक संतुलन की झलक दिखती है—भले ही वह अनौपचारिक मुस्कान और साझा थाली के बीच क्यों न हो।

महागठबंधन: स्वाद में सवाल, राजनीति में धार

वहीं महागठबंधन में मकर संक्रांति का दही-चूड़ा भोज सादगी के साथ राजनीतिक व्यंग्य भी परोसता है। राजद, कांग्रेस और अन्य घटक दलों के नेताओं के यहाँ आयोजित भोज सरकार के खिलाफ सवालों और वैकल्पिक राजनीति के संकेतों से भरे रहते हैं। इन भोजों में सत्ता के बजाय संघर्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति की खुशबू अधिक महसूस होती है।

तेजप्रताप यादव का दही-चूड़ा भोज: सियासत की सबसे दिलचस्प थाली

इस पूरे सियासी पर्व में सबसे ज़्यादा चर्चा में रहा राजद नेता तेजप्रताप यादव का दही-चूड़ा भोज। तेजप्रताप ने न सिर्फ महागठबंधन के नेताओं, बल्कि बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से लेकर एनडीए के कई बड़े नेताओं तक को आमंत्रण भेजकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। यह भोज महज़ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि संवाद, संकेत और संभावनाओं से भरा राजनीतिक प्रयोग माना जा रहा है।

तेजप्रताप का यह कदम बताता है कि बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा अब केवल गठबंधन की रेखाओं तक सीमित नहीं, बल्कि संवाद की एक नई जमीन भी तैयार कर रहा है।

क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय दल: संस्कृति में स्वीकार्यता की खोज

जहाँ क्षेत्रीय दल दही-चूड़ा भोज के ज़रिये अपनी मिट्टी से जुड़ाव दिखाते हैं, वहीं राष्ट्रीय दल इसी बहाने ‘बिहारियत’ में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश करते हैं। किसान, युवा, पिछड़ा-अतिपिछड़ा और दलित विमर्श—हर भोज के पीछे एक अलग सामाजिक संदेश छुपा होता है।

डिजिटल दौर का दही-चूड़ा

अब दही-चूड़ा भोज केवल आमंत्रितों तक सीमित नहीं। सोशल मीडिया पर लाइव तस्वीरें, रील्स और पोस्ट्स इसे डिजिटल राजनीति का हिस्सा बना देती हैं। किस नेता के यहाँ कौन पहुँचा, कौन नहीं पहुँचा—यही सियासी चर्चा का नया पैमाना बन गया है।

उत्तरायण की राजनीति

मकर संक्रांति का उत्तरायण सिर्फ सूर्य का नहीं, बिहार की राजनीति का भी होता है। दही-चूड़ा भोज के बहाने रिश्ते सुधरते हैं, तल्ख़ियाँ पिघलती हैं और आने वाले महीनों की राजनीतिक दिशा के संकेत मिलते हैं।

बिहार में दही-चूड़ा भोज अब लोकसंस्कृति और राजनीति का साझा मंच बन चुका है। थाली में दही-चूड़ा है, लेकिन उसके स्वाद में सत्ता, विरोध, गठबंधन और संभावनाओं की पूरी राजनीति घुली हुई है—और यही बिहार की सियासत की असली पहचान है।

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आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।