Bihar Land Dispute: अब जमीन पर होगी विजय सिन्हा की असली अग्निपरीक्षा

अभय पाण्डेय

पटनाः बिहार के नए-नवेले राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा के लिए यह विभाग महज़ एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक कठिन अग्निपरीक्षा है। यह परीक्षा केवल भ्रष्टाचार से नहीं, बल्कि उस भू-माफिया तंत्र से है जिसने वर्षों से राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक मिलीभगत के सहारे बिहार की जमीन पर अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है।

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बिहार में जमीन अब केवल संपत्ति नहीं रही, बल्कि सत्ता, धन और हिंसा का माध्यम बन चुकी है। ऐसे में जब विजय कुमार सिन्हा पारदर्शिता, जवाबदेही और आम आदमी को न्याय दिलाने की बात करते हैं, तो वे दरअसल पूरे राजनीति-प्रशासन-माफिया गठजोड़ को सीधी चुनौती दे रहे होते हैं।

नीतीश सरकार के सामने भूमि विवाद की गंभीर चुनौती

यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि बिहार में पहली बार नीतीश कुमार की सरकार बनने के साथ ही भूमि विवाद के मामलों पर उनकी सीधी और निरंतर नजर रही है।

2005 में सत्ता संभालने के बाद नीतीश कुमार ने भूमि विवाद को केवल राजस्व का नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानते हुए इसे प्राथमिकता दी। थाना, प्रखंड और जिला स्तर पर जनता दरबार की व्यवस्था शुरू की गई। स्वयं मुख्यमंत्री ने भी जनता दरबार में जमीन से जुड़े मामलों की सुनवाई की और प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए कि ऐसे विवादों का शीघ्र निपटारा किया जाए।

नीतीश सरकार द्वारा भूमि मामलों पर उठाए गए प्रमुख कदम


  • भूमि विवाद को कानून-व्यवस्था से जोड़ना (2005 के बाद)
    नीतीश कुमार की सरकार ने भूमि विवाद को केवल राजस्व का विषय न मानकर कानून-व्यवस्था का मुद्दा घोषित किया, जिससे पुलिस और प्रशासन दोनों की जवाबदेही तय हुई।

  • जनता दरबार की शुरुआत
    थाना, प्रखंड, जिला और राज्य स्तर पर जनता दरबार की व्यवस्था लागू की गई।
    स्वयं मुख्यमंत्री ने भी जनता दरबार में भूमि विवादों की सुनवाई की, जिससे आम नागरिकों को सीधी पहुंच मिली।

  • CO और DCLR स्तर पर त्वरित सुनवाई के निर्देश
    अंचलाधिकारी (CO) और भूमि सुधार उप समाहर्ता (DCLR) को भूमि विवादों के त्वरित निपटारे की जिम्मेदारी सौंपी गई और समय-सीमा तय की गई।

  • भूमि अभिलेखों का डिजिटाइजेशन
    जमाबंदी, खेसरा, खतियान और नक्शों को ऑनलाइन करने की प्रक्रिया शुरू की गई ताकि रिकॉर्ड से छेड़छाड़ और फर्जीवाड़े पर रोक लगे।

  • विशेष भूमि सर्वे की शुरुआत
    पुराने सर्वे (सर्वे ऑफ इंडिया / कैडस्ट्रल सर्वे) की खामियों को दूर करने के लिए विशेष भूमि सर्वे कराया गया, जिससे वास्तविक मालिकाना हक स्पष्ट करने का प्रयास हुआ।

  • भूमि विवाद निपटारा कानून और नियमावली
    भूमि विवादों के समाधान के लिए राजस्व न्यायालयों और अपीलीय व्यवस्था को सुदृढ़ किया गया।

  • भूमि से जुड़े मामलों की मॉनिटरिंग व्यवस्था
    जिला स्तर पर डीएम और एसपी की संयुक्त निगरानी में भूमि विवाद मामलों की समीक्षा बैठकों की व्यवस्था की गई।

  • भूमि विवाद से जुड़े अपराधों पर पुलिस को सख्ती के निर्देश
    जमीन विवाद से जुड़े हत्या, मारपीट और जबरन कब्जे जैसे मामलों में त्वरित FIR और कार्रवाई के निर्देश दिए गए।


इन सबके बावजूद जमीनी हकीकत यह रही कि भूमि विवाद बिहार की सबसे ज्वलंत और जटिल समस्या बना रहा। विवादों की संख्या घटने के बजाय लगातार बढ़ती गई और प्रशासनिक व्यवस्था इस बढ़ते दबाव को संभालने में असफल साबित हुई।

आंकड़े जो सिस्टम की नाकामी उजागर करते हैं

असहज सच बयान करते हैं राजस्व और पुलिस विभाग के ये आंकड़े
  • हर साल 3 से 3.5 लाख नए भूमि विवाद
  • NCRB और राज्य पुलिस के आंकड़ों के अनुसार 50–60% गंभीर आपराधिक मामलों की जड़ में जमीन
  • राज्य भर में 7–8 लाख से अधिक लंबित मामले
  • हजारों विवाद ऐसे, जो एक दशक से ज्यादा समय से फाइलों में कैद हैं

ये आंकड़े सिर्फ प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि यह सवाल उठाते हैं कि क्या विवाद जानबूझकर जिंदा रखे गए?

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बिहार लंबे समय तक उन राज्यों में शामिल रहा जहां भूमि विवाद से जुड़ी हिंसा और हत्या के मामले सर्वाधिक दर्ज हुए हैं। वर्तमान में राज्य भर में 7 से 8 लाख से अधिक भूमि विवाद मामले लंबित बताए जाते हैं, जिनमें से कई 5 से 10 वर्षों से निपटारे की प्रतीक्षा में हैं।

प्रशासनिक ढांचा: अक्षम या नियंत्रित?

भूमि विवाद न सुलझने की सबसे बड़ी वजह बताई जाती है-स्टाफ की कमी और तकनीकी बाधाएं। लेकिन खोजी नजर से देखें तो तस्वीर इससे ज्यादा गंभीर है-

  • कई जिलों में DCLR के 30–40% पद खाली
  • अंचल कार्यालयों में एक-एक कर्मचारी पर हजारों फाइलें
  • अधूरा डिजिटाइजेशन, विवादास्पद भूमि सर्वे

हालात को देखते हुए यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या यह महज लापरवाही है, या जानबूझकर सिस्टम को कमजोर रखा गया? क्योंकि कमजोर सिस्टम ही माफिया का सबसे मजबूत हथियार होता है।

जिलों में जमीन का खेल: पैटर्न साफ है

पटना और आसपास

राजधानी पटना, दानापुर, फुलवारी और बिहटा जैसे क्षेत्रों में सरकारी और निजी जमीन पर कब्जे के सबसे अधिक मामले सामने आते हैं। कार्रवाई की धीमी रफ्तार ने यह धारणा मजबूत की कि प्रभावशाली लोगों को संरक्षण प्राप्त है।

मुजफ्फरपुर–वैशाली क्षेत्र

यहां भूमि विवादों में राजनीतिक प्रभाव और स्थानीय दबंगई की भूमिका लगातार सामने आती रही है। जनता दरबार में आने वाली शिकायतों में इन जिलों की हिस्सेदारी हमेशा अधिक रही है।

गया, नवादा और औरंगाबाद

नए भूमि सर्वे के बाद इन जिलों में मालिकाना हक को लेकर विवादों में तेज़ वृद्धि दर्ज की गई। कई मामलों में पुराने भू-स्वामी खुद को अतिक्रमणकारी घोषित होते देख रहे हैं।

इन जिलों के अलावा भोजपुर, रोहतास, कैमूर, बक्सर सहित बिहार के लगभग हर जिले में भूमि से जुड़े मामलों की स्थिति कमोबेश यही रही है।

भू-माफिया और संरक्षण: विवाद की जड़

प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में यह एक स्थापित सच्चाई मानी जाती है कि बिहार के कई भू-माफियाओं को अप्रत्यक्ष राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त रहा है। चुनावी समय में यही नेटवर्क फंड, मैनेजमेंट और दबाव के लिए उपयोगी साबित होते रहे, जिसके बदले उनके खिलाफ कार्रवाई या तो टलती रही या कमजोर कर दी गई। इसी कारण भूमि विवाद महज़ कानूनी समस्या नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन का मुद्दा बन गया।

विजय कुमार सिन्हा की एंट्री: सख्ती और नए संकेत

नई सरकार में भूमि एवं राजस्व मंत्री बनने के बाद विजय कुमार सिन्हा ने विभाग को स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की। फर्जी दस्तावेज़ों पर अनिवार्य FIR, लापरवाह और भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों पर निलंबन, शिकायत निपटारे के लिए समय-सीमा तय करने और मामलों को अनावश्यक रूप से उच्च स्तर पर न भेजने जैसे निर्देश जारी किए गए। सरकार का दावा है कि इन निर्देशों के बाद कई जिलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हुई है।

जनता दरबार: आम आदमी की राहत या दिखावा?

जनता दरबार के माध्यम से आम लोगों को सीधी सुनवाई का मंच मिला और कई मामलों में त्वरित जांच व कार्रवाई से राहत भी मिली। हालांकि, भू-माफिया से जुड़े मामलों में अक्सर आदेशों के अमल में कमजोरी दिखी और कई फरियादी दोबारा उसी सिस्टम में उलझते नजर आए।

जमीन की जंग अब सिस्टम से:  विजय सिन्हा की असली अग्निपरीक्षा शुरू

नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल से ही भूमि विवाद को गंभीरता से लिया और जनता दरबार जैसी व्यवस्थाएं शुरू कीं, लेकिन समस्या अपनी जड़ों के कारण बनी रही।

आज विजय कुमार सिन्हा उसी अधूरी लड़ाई को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह लड़ाई केवल एक मंत्री की नहीं, बल्कि भू-माफिया, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक जड़ता के खिलाफ टकराव की है। अब सवाल यही है—क्या यह अग्निपरीक्षा केवल इच्छाशक्ति तक सीमित रहेगी, या बिहार की जमीन पर सचमुच सिस्टम बदलेगा? इसका फैसला अभी होना बाकी है।

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आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।