अभय वाणीः बिहार में पुलिस महानिदेशक की कुर्सी एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह कोई बड़ा अपराध या कानून-व्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि खुद उस कुर्सी पर बैठे अधिकारी का फैसला है। बिहार के DGP विनय कुमार ने VRS ले लिया है और सरकार ने उन्हें राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त कर दिया है। खास बात यह है कि उनका निर्धारित कार्यकाल दिसंबर 2026 तक था, लेकिन उससे पहले ही उन्होंने पुलिस की सर्वोच्च जिम्मेदारी छोड़ दी।
विनय कुमार का VRS इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि बिहार के पुलिस इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब किसी DGP ने नियमित सेवानिवृत्ति से पहले सेवा छोड़ी हो। M.K. झा से लेकर विनय कुमार तक की यात्रा देखें तो कहानी सिर्फ VRS की नहीं है। यह बताती है कि समय के साथ DGP की कुर्सी से विदाई के रास्ते भी बदलते गए हैं।
कभी नियमित रिटायरमेंट, कभी समय से पहले पद से हटाया जाना, कभी दूसरी जिम्मेदारी और कभी केंद्र में नई भूमिका—बिहार में DGP की कहानी को समझने के लिए यह देखना भी जरूरी है कि अधिकारी ने यह कुर्सी छोड़ी कैसे।
जब DGP की कुर्सी लंबी पारी का पर्याय थी
बिहार पुलिस के पुराने दौर में DGP का पद अपेक्षाकृत लंबी प्रशासनिक पारी का हिस्सा माना जाता था। लेकिन समय के साथ तस्वीर बदली। DGP बदलना सिर्फ रिटायरमेंट की वजह से नहीं रहा। प्रशासनिक फैसले, स्थानांतरण, दूसरी जिम्मेदारियां और केंद्रीय प्रतिनियुक्तियां भी इस पद की विदाई का रास्ता बनने लगीं।
यहीं से एक अहम सवाल सामने आया—DGP की कुर्सी पर बैठना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि अधिकारी वहां से बाहर कैसे जाता है।
D.P. ओझा से शुरू हुआ समय से पहले विदाई का चर्चित अध्याय
2003 में D.P. ओझा का मामला इस बदलाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। दिसंबर 2003 में उन्हें DGP पद से हटा दिया गया और उनकी जगह वारिस हयात को पुलिस महानिदेशक बनाया गया। उस समय ओझा की निर्धारित सेवानिवृत्ति में करीब दो महीने बाकी थे।
ओझा के कार्यकाल के दौरान अपराध और राजनीतिक संरक्षण को लेकर उनकी सख्त टिप्पणियां और तत्कालीन सरकार के साथ मतभेद सार्वजनिक चर्चा में रहे। बाद में उन्होंने VRS ले लिया। इस तरह DGP पद से समय से पहले हटाए जाने और उसके बाद VRS लेने का एक चर्चित अध्याय बिहार के पुलिस इतिहास में दर्ज हुआ।
अभयानंद ने दिखाया दूसरा रास्ता
करीब एक दशक बाद 2014 में अभयानंद का मामला सामने आया। अगस्त 2011 में DGP बने अभयानंद को जून 2014 में DGP पद से हटाकर DG-cum-Commandant General, Home Guards की जिम्मेदारी दी गई। उनकी सेवानिवृत्ति में करीब छह महीने बाकी थे और उनकी जगह पी.के. ठाकुर को DGP बनाया गया।
यह VRS नहीं था, लेकिन इससे एक बात साफ हुई—DGP की कुर्सी से विदाई का रास्ता सिर्फ रिटायरमेंट नहीं है। किसी अधिकारी को दूसरी जिम्मेदारी देकर भी पुलिस प्रमुख बदला जा सकता है।
गुप्तेश्वर पांडेय ने VRS को फिर सुर्खियों में ला दिया
22 सितंबर 2020 को DGP रहते गुप्तेश्वर पांडेय ने VRS ले लिया। उनकी नियमित सेवानिवृत्ति कुछ महीने बाद होनी थी। VRS के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी चर्चा हुई और कुछ ही दिनों बाद वे जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हो गए।
VRS लेना अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं है। लेकिन जब कोई अधिकारी पुलिस के सर्वोच्च पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर तुरंत सार्वजनिक या राजनीतिक जीवन की ओर बढ़ता है, तो घटनाक्रम स्वाभाविक रूप से ज्यादा ध्यान खींचता है।
R.S. Bhatti ने दिखाया एक और रास्ता
R.S. Bhatti का मामला इससे अलग था। दिसंबर 2022 में बिहार के DGP बने भट्टी ने अगस्त 2024 में बिहार की पुलिस कमान छोड़ी, जब केंद्र सरकार ने उन्हें CISF का महानिदेशक नियुक्त किया। वे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर केंद्र चले गए।
इसलिए उनकी विदाई को VRS या समय से पहले हटाए जाने की श्रेणी में रखना सही नहीं होगा। लेकिन यह उदाहरण बताता है कि DGP की कुर्सी छोड़ने का एक रास्ता केंद्रीय जिम्मेदारी भी हो सकता है।
अब विनय कुमार: VRS के साथ नई जिम्मेदारी
विनय कुमार ने 25 सितंबर 2026 को VRS के लिए आवेदन किया। सरकार ने अगले ही दिन इसे तत्काल प्रभाव से मंजूर कर लिया और उन्हें बिहार का राज्य मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त कर दिया। उनका DGP के रूप में निर्धारित कार्यकाल दिसंबर 2026 तक था।
यहीं विनय कुमार का मामला अलग नजर आता है। DGP की कुर्सी छोड़ने के तुरंत बाद उन्हें एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक पद की जिम्मेदारी मिली। DGP और मुख्य सूचना आयुक्त की भूमिकाएं बिल्कुल अलग हैं—एक पुलिस प्रशासन की कमान संभालता है तो दूसरा सूचना के अधिकार और सरकारी जवाबदेही से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसलिए विनय कुमार का VRS केवल एक अधिकारी के सेवा छोड़ने की खबर नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है जिसमें पुलिस के सर्वोच्च पद से निकलने वाला अधिकारी तुरंत एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारी संभालता है।
M.K. झा से विनय कुमार तक आखिर बदला क्या?
चार दशक से ज्यादा की इस यात्रा को देखें तो बिहार में DGP की कुर्सी राज्य के बदलते प्रशासनिक दौर का आईना नजर आती है। एक दौर में लंबी पारी महत्वपूर्ण थी। फिर समय से पहले पद से हटाए जाने के उदाहरण आए। दूसरी जिम्मेदारी देकर पुलिस प्रमुख बदले गए। VRS ने अलग तरह की चर्चा पैदा की और केंद्रीय प्रतिनियुक्ति ने एक और रास्ता दिखाया। अब विनय कुमार ने VRS लेकर मुख्य सूचना आयुक्त की जिम्मेदारी संभाली है।
यानी कहानी सिर्फ यह नहीं है कि बिहार में कितने DGP हुए। असली कहानी यह भी है कि DGP बनने के बाद उनकी पारी खत्म कैसे हुई।
सवाल विनय कुमार से ज्यादा व्यवस्था का है
विनय कुमार ने VRS क्यों लिया—इस पर अनुमान लगाना उचित नहीं होगा। तथ्य यह है कि उन्होंने VRS का आवेदन दिया, सरकार ने उसे तत्काल मंजूर किया और उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया।
इसलिए सवाल व्यक्ति से ज्यादा व्यवस्था पर होना चाहिए। क्या वरिष्ठ अधिकारियों के VRS और उसके बाद मिलने वाली सार्वजनिक जिम्मेदारियों के लिए नियम और प्रक्रिया और अधिक स्पष्ट होनी चाहिए? क्या DGP जैसे संवेदनशील पद पर कार्यकाल और स्थिरता को लेकर व्यवस्था पर्याप्त मजबूत है? और अगर किसी DGP को समय से पहले हटाया जाता है तो क्या उसके कारणों की सार्वजनिक व्याख्या होनी चाहिए? क्योंकि DGP बदलना प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन पुलिस व्यवस्था की निरंतरता बनाए रखना संस्थागत जिम्मेदारी है।
अब अगला सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बिहार का अगला DGP कौन होगा। सवाल यह भी है कि उसे कितनी संस्थागत स्थिरता मिलेगी और उसकी पारी किस तरह खत्म होगी। M.K. झा से विनय कुमार तक चेहरे बदलते रहे, रास्ते बदलते रहे—लेकिन सवाल आज भी वही है: बिहार में सिर्फ DGP बदल रहे हैं या DGP की कुर्सी का मतलब भी बदल रहा है?





