Sunday, August 9, 2026

अंगूठा छाप विधायक, डिजिटल सेवक चाहिए! लोकतंत्र की यह कैसी तस्वीर?

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अभय वाणीः बिहार में विधायकों के पीए और पीएस की योग्यता को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का बयान पहली नजर में कर्मचारियों की कंप्यूटर दक्षता से जुड़ा दिखाई देता है, लेकिन इसके भीतर लोकतंत्र की कार्यप्रणाली से जुड़ा एक बड़ा और असहज सवाल छिपा है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि अगर विधायक का पीए या पीएस विधायक से कम कंप्यूटर जानता है तो उसे हटा देना चाहिए। उनके मुताबिक विधायक से ज्यादा जानने वाला सहयोगी चाहिए। उन्होंने पीए-पीएस की नियमित ट्रेनिंग की जरूरत बताई है और हर दो महीने में क्लास कराने की बात कही है। फेसबुक और इंस्टाग्राम के माध्यम से जनता से बेहतर संवाद को भी इस प्रशिक्षण का हिस्सा बनाने की बात कही गई है।

निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री की यह सोच स्वागतयोग्य है। आज के डिजिटल दौर में विधायकों और मंत्रियों के सहायक पढ़े-लिखे, दक्ष और आधुनिक तकनीक की समझ रखने वाले हों, यह जरूरी है। पीए और पीएस केवल फोन उठाने, फाइल संभालने या मिलने वालों की सूची बनाने वाले कर्मचारी नहीं हैं। वे जनप्रतिनिधि के कामकाज को व्यवस्थित करने, सूचनाओं को संकलित करने, जनता की समस्याओं को संबंधित विभाग तक पहुंचाने और विधायक या मंत्री के काम को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए उनका तकनीकी रूप से दक्ष और समय के साथ अपडेट होना व्यवस्था की जरूरत है।

लेकिन मुख्यमंत्री के बयान का यही सकारात्मक पक्ष एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है—जब पीए को विधायक से ज्यादा जानना जरूरी है, तो विधायक को अपने पीए से कम जानने की छूट आखिर क्यों हो?

सवाल पीए की योग्यता का नहीं, विधायक की क्षमता का भी है

विधायक जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि है। विधानसभा में वही जनता की आवाज बनता है, सरकार से सवाल पूछता है, बजट और नीतियों पर बहस करता है और कानून बनाने की प्रक्रिया में भाग लेता है। ऐसे में उसके कार्यालय में काम करने वाला सहायक उससे अधिक तकनीकी दक्ष हो, इसमें कोई बुराई नहीं। बल्कि आज के समय में यह अच्छी बात है। हर विधायक को कंप्यूटर विशेषज्ञ होने की जरूरत भी नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब सहायक की दक्षता जनप्रतिनिधि की अक्षमता को ढकने लगे और पीए धीरे-धीरे विधायक के काम का सहायक नहीं, उसकी जगह लेने लगे।

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सोचिए, ई-मेल आया तो पीए देख रहा है, सरकारी पोर्टल पर कोई जरूरी सूचना आई तो पीए पढ़ रहा है, ऑनलाइन शिकायत मिली तो पीए समझ रहा है, सोशल मीडिया पर जनता सवाल पूछ रही है तो पीए जवाब तैयार कर रहा है और किसी सरकारी दस्तावेज में क्या लिखा है, यह भी पीए ही समझा रहा है। विधायक अगर हर तकनीकी और प्रशासनिक मामले में अपने सहायक की ओर देखने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है—जनता ने विधायक चुना है या उसके कार्यालय का डिजिटल मैनेजर?

यह सवाल किसी एक विधायक या किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति पर सवाल है जिसमें चुनाव जीत जाना जनप्रतिनिधि बनने की पहली और शायद आखिरी योग्यता मान लिया जाता है, जबकि पद संभालने के बाद लगातार सीखने, अपनी क्षमता बढ़ाने और बदलते समय के साथ खुद को अपडेट करने की जिम्मेदारी पर उतनी गंभीरता से बात नहीं होती।

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मुख्यमंत्री ने पीए-पीएस के नियमित प्रशिक्षण की बात की है। यह अच्छी पहल है। लेकिन इसी विचार को एक कदम आगे ले जाने की जरूरत है। अगर हर दो महीने में सहायकों की क्लास हो सकती है तो विधायकों और मंत्रियों के लिए भी नियमित प्रशिक्षण क्यों नहीं? कंप्यूटर की बुनियादी समझ, डिजिटल प्रशासन, सरकारी योजनाएं, बजट, कानून, विधानसभा की कार्यप्रणाली, सोशल मीडिया और डिजिटल जनसंवाद जैसे विषयों पर जनप्रतिनिधियों को भी समय-समय पर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। कम से कम इतना ज्ञान तो हर विधायक और मंत्री में होना ही चाहिए कि वह अपने सहायक के काम को परख सके, उसकी दी गई जानकारी को समझ सके और सही-गलत का फैसला कर सके।

सहायक अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ हो सकता है और होना भी चाहिए। लेकिन जनप्रतिनिधि इतना सक्षम जरूर हो कि अपने ही सहायक की विशेषज्ञता का विवेकपूर्ण इस्तेमाल कर सके। सहायक की विशेषज्ञता जनप्रतिनिधि की ताकत बने, उसकी बैसाखी नहीं। आखिर लोकतंत्र में जनता ने पीए को नहीं, विधायक को चुना है और इसलिए अंतिम जवाबदेही भी विधायक की ही होगी।

फेसबुक पर पोस्ट करना जनता से संवाद नहीं

मुख्यमंत्री ने फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिए जनता से बेहतर कनेक्शन की बात भी कही है। यह आज की राजनीति की वास्तविक जरूरत है, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना होगा—सोशल मीडिया मैनेजमेंट और जनसंवाद एक ही चीज नहीं हैं। विधायक के फेसबुक पेज पर रोज तस्वीरें पोस्ट होती रहें, कार्यक्रमों के वीडियो आते रहें, शुभकामनाओं के संदेश चलते रहें और उपलब्धियों की लंबी सूची दिखाई देती रहे, तो इसका अर्थ यह नहीं कि विधायक जनता से जुड़ा हुआ है।

जनता से जुड़ाव तब साबित होता है जब विधायक उसकी समस्याओं के बीच दिखाई दे। किसी गरीब की पेंशन अटकी है तो उसके समाधान के लिए खड़ा हो, किसी गांव की सड़क टूटी है तो वहां पहुंचे, अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं तो सवाल उठाए, स्कूल में शिक्षक नहीं हैं तो जवाब मांगे और बेरोजगार युवा सवाल कर रहा है तो उसके सामने खड़ा हो। फेसबुक पर ‘जनता के साथ’ लिखना आसान है, वास्तव में जनता के साथ खड़ा होना मुश्किल। सोशल मीडिया जनता तक पहुंचने का माध्यम हो सकता है, जनता के बीच होने का विकल्प नहीं।

इसलिए डिजिटल संवाद को केवल पोस्ट, लाइक और कमेंट तक सीमित कर देना लोकतंत्र को सोशल मीडिया मैनेजमेंट समझ लेने जैसा होगा। तकनीक का असली इस्तेमाल जनता की शिकायत सुनने, उसकी समस्या का समाधान करने और जनप्रतिनिधि को अधिक जवाबदेह बनाने में होना चाहिए।

माननीय को भी सीखना होगा

पीए विधायक से ज्यादा कंप्यूटर जानता है, इसमें कोई समस्या नहीं। बल्कि एक कुशल और तकनीकी रूप से दक्ष सहायक किसी भी विधायक या मंत्री के काम को बेहतर बना सकता है। आधुनिक शासन में जनप्रतिनिधियों के साथ विशेषज्ञों और प्रशिक्षित सहायकों की टीम होनी ही चाहिए। लेकिन विधायक को इतना जरूर पता होना चाहिए कि उसका सहायक क्या कर रहा है। वह जो जानकारी दे रहा है, वह सही है या गलत; जिस दस्तावेज के आधार पर कोई निर्णय लिया जा रहा है, उसका अर्थ क्या है; जनता की शिकायत किस विभाग से जुड़ी है और सोशल मीडिया पर जो संदेश जा रहा है, उसका तथ्य और प्रभाव क्या है—इन सबको समझने की बुनियादी क्षमता जनप्रतिनिधि में होनी ही चाहिए।

उसे तकनीकी विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं, लेकिन तकनीक से पूरी तरह अनभिज्ञ रहने की छूट भी नहीं हो सकती। उसे कानून का विद्वान बनने की जरूरत नहीं, लेकिन कानून पढ़ने और समझने की क्षमता तो होनी ही चाहिए। उसे सोशल मीडिया एक्सपर्ट बनने की जरूरत नहीं, लेकिन यह समझ जरूर होनी चाहिए कि जनता से डिजिटल संवाद किस जिम्मेदारी के साथ किया जाता है।

सहायक विधायक की मदद कर सकता है, विधायक की जगह नहीं ले सकता। विशेषज्ञता सहायक के पास हो सकती है, लेकिन निर्णय और जवाबदेही की अंतिम जिम्मेदारी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की ही होती है।

राजनीति अब केवल भाषण, पोस्टर और भीड़ की राजनीति नहीं रह गई है। शासन डेटा पर चलता है, योजनाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हैं, सरकारी सेवाएं ऑनलाइन हैं, शिकायतें पोर्टल पर दर्ज होती हैं और सूचनाएं कुछ सेकंड में उपलब्ध हो सकती हैं। ऐसे समय में जनप्रतिनिधि का तकनीक से पूरी तरह अनभिज्ञ रहना कोई उपलब्धि नहीं हो सकती। बदलती दुनिया के साथ बदलना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है।

लोकतंत्र में अंगूठा विधायक लगाए और सिस्टम पीए चलाए?

यहीं यह पूरा प्रसंग एक गहरी लोकतांत्रिक विडंबना में बदल जाता है। कल्पना कीजिए—कुर्सी पर विधायक बैठे हैं, सामने जनता है और जनता सवाल पूछ रही है। विधायक पीए की ओर देखते हैं। पीए कंप्यूटर खोलता है, जानकारी खोजता है, जवाब तैयार करता है और विधायक वही जवाब जनता को सुना देते हैं। तब जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है—हमने प्रतिनिधि चुना था या प्रतिनिधि का पीए?

हम अक्सर कहते हैं कि नेता पढ़ा-लिखा होना चाहिए, समझदार होना चाहिए और आधुनिक सोच वाला होना चाहिए। लेकिन चुनाव जीतने के बाद उसके लिए सीखते रहने, अपनी क्षमता बढ़ाने और बदलती दुनिया के साथ खुद को अपडेट करने की कोई स्पष्ट सामाजिक या राजनीतिक अपेक्षा क्यों नहीं बनती? क्या केवल इसलिए कि वह जनता के वोट से चुनकर आया है, वह सीखने की जिम्मेदारी से मुक्त हो गया? निश्चित तौर पर नहीं।

इसलिए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की बात को खारिज करने के बजाय उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। हां, विधायक और मंत्री के पीए-पीएस पढ़े-लिखे हों, आधुनिक तकनीक जानते हों, डिजिटल माध्यमों को समझते हों, जनता से बेहतर संवाद कर सकें और नियमित प्रशिक्षण पाएं। लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि विधायक और मंत्री स्वयं इतने सक्षम हों कि अपने सहायकों के काम को समझ, परख और नियंत्रित कर सकें।

क्योंकि अंततः जिम्मेदारी सहायक की नहीं, जनप्रतिनिधि की है। पीए गलत जानकारी देता है तो सवाल विधायक से होगा। सोशल मीडिया पर गलत संदेश जाता है तो जवाब विधायक को देना होगा। जनता की शिकायत दब जाती है तो जवाबदेही विधायक की होगी। लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी किसी पीए को आउटसोर्स नहीं कर सकता।

बिहार को ऐसे विधायक नहीं चाहिए जिन्हें हर डिजिटल काम के लिए पीए की ओर देखना पड़े। बिहार को ऐसे विधायक चाहिए जो अपने सहायकों की विशेषज्ञता का पूरा लाभ उठाएं, लेकिन स्वयं भी इतने सक्षम हों कि उस विशेषज्ञता को समझ सकें, परख सकें और सही दिशा दे सकें।

क्योंकि डिजिटल लोकतंत्र का मतलब यह नहीं कि विधायक अंगूठा लगाए और पीए सिस्टम चलाए। डिजिटल लोकतंत्र का मतलब है—जनप्रतिनिधि खुद सक्षम हो, उसका कार्यालय सक्षम हो और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही भी उतनी ही आधुनिक, पारदर्शी और तेज हो। वरना लोकतंत्र का नया मुहावरा कुछ यूं होगा— “वोट माननीय को, ज्ञान पीए का और जवाबदेही… किसी की नहीं!”

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttp://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

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