अभय वाणीः कहते हैं कि लोकतंत्र में हर नागरिक को बराबरी का अवसर मिलता है। यह बात बिल्कुल सच है। फर्क बस इतना है कि कुछ लोगों को अवसर जन्म के साथ मिल जाता है और बाकी लोग पूरी उम्र योग्यता ढोते रह जाते हैं।
संविधान की किताब बनाम सत्ता की किताब
संविधान के अनुच्छेद 171 में राज्यपाल के मनोनयन के लिए साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता और समाजसेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव की बात कही गई है। लेकिन लगता है संविधान की किताब और सत्ता की किताब, दोनों के संस्करण अलग-अलग छपते हैं। अब नई योग्यता सामने है—“नेता का बेटा होना।”
RLM चीफ और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा एवं सासाराम की विधायक स्नेहलता कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश को राज्यपाल द्वारा विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किए जाने के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है। खासकर तब, जब उनका मनोनयन ऐसे समय हुआ, जब उनके मंत्री पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठ रहे थे। मनोनयन के बाद उनका मंत्री पद जारी रखने का रास्ता साफ हो गया। लेकिन सच यह है कि मसला सिर्फ दीपक प्रकाश का नहीं है।
मुद्दा एक बेटे का नहीं, 12 सीटों का है
मसला उन 12 सीटों का है, जिन्हें संविधान ने समाज के अलग-अलग क्षेत्रों की विशिष्ट प्रतिभाओं को विधानमंडल तक पहुंचाने के लिए रखा था और जिन्हें राजनीति ने धीरे-धीरे अपने राजनीतिक प्रबंधन का हिस्सा बना लिया।
बिहार विधान परिषद की इन मनोनीत सीटों पर नजर डालें तो अशोक चौधरी, जनक राम, डॉ. राज्यवर्धन आजाद, राम वचन राय, संजय कुमार सिंह, ललन कुमार सर्राफ, राजेंद्र प्रसाद गुप्ता, संजय सिंह, प्रमोद कुमार चंद्रवंशी, घनश्याम ठाकुर, निवेदिता सिंह और अब दीपक प्रकाश का नाम शामिल है।
इन नामों में राम वचन राय जैसे साहित्यकार, डॉ. राज्यवर्धन आजाद जैसे ख्यात चिकित्सक और अब प्रोफेसर (शिक्षाविद्द) बन चुके अशोक चौधरी संविधान की भावना के सबसे करीब दिखाई देते हैं। शेष नामों में अधिकांश की पहचान सक्रिय राजनीतिक जीवन से जुड़ी रही है।
अब सवाल यह है कि अगर मनोनीत सीटों पर भी अंततः राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों को ही आना है, तो फिर इन सीटों को मनोनीत करने की जरूरत ही क्या है?
जब नेता ही आना है तो चुनाव क्यों नहीं?
विधान परिषद में आने के लिए चुनाव का रास्ता खुला है। नेता हैं तो चुनाव लड़िए। जनता के बीच जाइए। वोट मांगिए। जीतकर आइए। फिर राज्यपाल के मनोनयन की सुविधा क्यों?
कहीं मनोनयन की व्यवस्था इसलिए तो नहीं बनाई गई थी कि चुनावी राजनीति से बाहर का रास्ता कठिन होने पर सत्ता अपने लोगों के लिए पिछला दरवाजा खोल दे।
राजनीति करनी है तो जनादेश लीजिए। समाजसेवा, साहित्य, विज्ञान या कला में असाधारण योगदान है तो मनोनयन का रास्ता आपके लिए है। दोनों रास्तों को आपस में मिला देने से संविधान की मंशा ही धुंधली हो जाती है।
कभी बटुकेश्वर दत्त आते थे, आज राजनीतिक गणित आता है
हैरत की बात यह है कि इसी व्यवस्था के जरिए कभी बटुकेश्वर दत्त जैसे स्वतंत्रता सेनानी, बाबूलाल मधुकर जैसे मगही कवि और सियाराम तिवारी जैसे तबला वादक विधान परिषद तक पहुंचे थे। तब मनोनयन का मतलब था—जिस प्रतिभा को चुनावी राजनीति शायद सदन तक नहीं पहुंचा सकती, उसे संविधान स्वयं रास्ता दे। आज तस्वीर उलटती हुई दिखाई देती है। अब सवाल प्रतिभा का कम और राजनीतिक उपयोगिता का ज्यादा हो गया है।
यह किसी एक दल की बीमारी नहीं
यह किसी एक दल की बीमारी नहीं है। सत्ता बदलती है, लेकिन सत्ता का चरित्र नहीं बदलता। विपक्ष में रहते हुए जो मनोनयन “लोकतंत्र की हत्या” लगता है, वही सत्ता में आते ही “संवैधानिक अधिकार” बन जाता है।
दल बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं—लेकिन मनोनीत सीटों को अपने राजनीतिक कुनबे के विस्तार के लिए इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति बनी रहती है। यही इस व्यवस्था का सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण पक्ष है।
12 सीटें या सत्ता का राजनीतिक कोटा?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि संस्थाएँ धीरे-धीरे व्यक्तियों की सुविधा के लिए इस्तेमाल होने लगती हैं। राज्यपाल का विवेक, विधान परिषद का उद्देश्य और संविधान की आत्मा—सब राजनीतिक प्रबंधन की फाइल में नत्थी कर दिए जाते हैं।
12 सीटें समाज की विविध प्रतिभाओं का प्रतिनिधित्व करने के बजाय सत्ता के राजनीतिक कोटे जैसी दिखाई देने लगें, तो सवाल व्यक्ति पर नहीं, व्यवस्था पर उठना चाहिए।
और सवाल यह भी कि जिस व्यवस्था का इस्तेमाल बार-बार राजनीतिक लोगों को विधान परिषद में लाने के लिए किया जा रहा है, क्या उसमें सुधार की जरूरत नहीं है?
तो फिर मनोनयन का यह विशेषाधिकार क्यों?
अगर राजनीतिक दलों को इन सीटों पर अपने ही नेताओं और राजनीतिक सहयोगियों को भेजना है, तो फिर इस व्यवस्था को खत्म कर देना ही बेहतर क्यों न हो?
नेता ही आएं तो चुनाव लड़कर आएं।
राज नेताओं को MLC ही बनना है तो जनता के बीच जाएं। अपना जनाधार साबित करें। लोकतंत्र में प्रवेश का जनादेश हासिल करें।
और राज्यपाल के मनोनयन का रास्ता उन लोगों के लिए खुला रहे, जिनकी प्रतिभा राजनीति से बाहर है, लेकिन समाज और विधानमंडल को उनकी जरूरत है। वरना संविधान में एक नई योग्यता जोड़ देनी चाहिए— “राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य बनने की पहली योग्यता: किसी प्रभावशाली नेता का पुत्र, पुत्री या राजनीतिक रूप से उपयोगी व्यक्ति होना। शेष योग्यताएं राजनीतिक आवश्यकता के अनुसार स्वतः लागू मानी जाएंगी।” आखिर लोकतंत्र में अब योग्यता नहीं, राजनीतिक उपयोगिता ही सबसे बड़ा प्रमाणपत्र जो ठहरी!
