अभय वाणीः पटना के बांकीपुर से प्रशांत किशोर की जीत को केवल एक विधानसभा सीट का चुनावी परिणाम मान लेना शायद जल्दबाजी होगी। असली सवाल यह है कि इस जीत ने किसकी राजनीतिक गणित बिगाड़ी है? सत्ता पक्ष की, जिसे विधानसभा में एक नई और मुखर आवाज का सामना करना होगा? या विपक्ष की, जिसके सामने अब एक ऐसा चेहरा खड़ा है, जो सरकार से सवाल पूछने के साथ-साथ विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठा सकता है?
पहली नजर में स्वाभाविक जवाब सत्ता पक्ष दिखाई देता है। एक नया विधायक विधानसभा में पहुंचा है। वह राजनीतिक व्यवस्था के बाहर से आया है। उसके पास स्थापित दलों जैसा संगठन नहीं है, लेकिन उसके पास सवाल उठाने की आजादी है। वह सरकार के कामकाज पर सवाल करेगा, नीतियों की आलोचना करेगा और जनता के मुद्दे सदन में उठाएगा। जाहिर है, इससे सत्ता के लिए एक नई चुनौती पैदा होती है। लेकिन बिहार की राजनीति को थोड़ा गहराई से देखिए तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
असली चुनौती शायद सत्ता के सामने नहीं, विपक्ष के सामने है
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछने की पहली जिम्मेदारी विपक्ष की होती है। विपक्ष का काम केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि उसे लगातार जवाबदेह बनाए रखना भी है। लेकिन बिहार की राजनीति में विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या उसकी संख्या नहीं, उसकी विश्वसनीयता बनती जा रही है।
जब विपक्ष सरकार पर भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी, शिक्षा या स्वास्थ्य को लेकर सवाल उठाता है, तो सत्ता पक्ष कई बार सवाल का जवाब देने के बजाय विपक्ष के पुराने रिकॉर्ड की ओर इशारा कर देता है। राजनीतिक अतीत, भ्रष्टाचार के आरोप, परिवारवाद, सत्ता के पुराने फैसले और विवाद बहस का हिस्सा बन जाते हैं। फिर सवाल यह नहीं रह जाता कि सरकार ने क्या किया। सवाल यह बन जाता है कि सवाल पूछने वाला खुद कितना साफ है। और यहीं से विपक्ष की धार कुंद होती है।
सरकार पर हमला करने वाला विपक्ष जब खुद अपने राजनीतिक अतीत के बचाव में उलझ जाता है, तो जनता के असली सवाल पीछे छूट जाते हैं। लोकतंत्र में यह स्थिति सत्ता के लिए सुविधाजनक हो सकती है, लेकिन जनता के लिए नहीं। और यहीं प्रशांत किशोर की जीत का महत्व बढ़ जाता है।
एक सीट, लेकिन राजनीतिक असर बड़ा
प्रशांत किशोर के पास विधानसभा में संख्या नहीं है। उनके साथ कोई बड़ा विपक्षी विधायक दल नहीं है। वे सरकार को गिराने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन लोकतंत्र में हर प्रभाव संख्या से तय नहीं होता। कई बार एक आवाज इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उसके सवाल का जवाब देना सत्ता के लिए आसान नहीं होता।
प्रशांत किशोर के सामने फिलहाल सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी यही है कि वे पारंपरिक सत्ता-विपक्ष की राजनीति के उसी पुराने ढांचे का हिस्सा नहीं रहे हैं। इसलिए यदि वे सरकार से कोई सवाल उठाते हैं, तो सत्ता पक्ष के लिए उस सवाल को केवल विपक्ष के अतीत की ओर मोड़ देना उतना आसान नहीं होगा। शायद यही वजह है कि उनकी एक सीट का राजनीतिक महत्व उनकी संख्या से कहीं बड़ा हो सकता है।
यह चुनौती केवल सत्ता पक्ष और मुख्य विपक्ष तक सीमित नहीं रहने वाली। बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी, तेजस्वी यादव और चिराग पासवान जैसे स्थापित चेहरों के बीच प्रशांत किशोर का उभरना आने वाले दिनों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक नया आयाम जोड़ सकता है। खासकर चिराग पासवान के लिए यह चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि वे भी बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी और नए राजनीतिक विकल्प की राजनीति का दावा करते रहे हैं। प्रशांत किशोर का उसी राजनीतिक स्पेस में अपनी जगह बनाना इस प्रतिस्पर्धा को और दिलचस्प बना सकता है। लेकिन इस बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के साथ प्रशांत किशोर के सामने एक बड़ा खतरा भी है।
जनता ने आवाज चुनी है, केवल चेहरा नहीं
प्रशांत किशोर को अगर विधानसभा में सिर्फ सुर्खियां बटोरने वाला विधायक बनना है, तो यह अवसर बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा। लेकिन यदि वे तैयारी के साथ सवाल पूछते हैं, सरकारी आंकड़ों और दस्तावेजों के आधार पर सरकार को घेरते हैं, जनहित के मुद्दों को लगातार उठाते हैं और आलोचना के साथ वैकल्पिक नीतियां भी सामने रखते हैं, तो उनकी भूमिका बदल सकती है।
तब पीके सिर्फ बांकीपुर के विधायक नहीं रहेंगे। वे उस राजनीतिक खालीपन की आवाज बन सकते हैं, जिसे बिहार का कमजोर विपक्ष भर नहीं पा रहा है।
यहां उनसे एक विधायक से कहीं ज्यादा अपेक्षा की जाएगी। क्योंकि जिस क्षण जनता किसी एक व्यक्ति को विपक्ष की उम्मीद के रूप में देखने लगती है, उसी क्षण उसकी जिम्मेदारी भी सामान्य जनप्रतिनिधि से कई गुना बढ़ जाती है।
अब परीक्षा प्रशांत किशोर की भी है
लेकिन प्रशांत किशोर के लिए इस उम्मीद का दूसरा पहलू भी है। उन्हें यह साबित करना होगा कि उनकी राजनीति केवल विरोध की राजनीति नहीं है। सरकार की हर बात का विरोध करना विपक्ष नहीं होता। विपक्ष वह है जो सरकार से सवाल करे, लेकिन जहां सरकार सही हो वहां सही को सही कहने का साहस भी रखे।
उन्हें यह भी साबित करना होगा कि विधानसभा उनके लिए राजनीतिक प्रचार का मंच नहीं, बल्कि जनता के सवालों का मंच है। यदि वे इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, तो बिहार की राजनीति में उनके लिए एक नया रास्ता खुल सकता है। क्योंकि राजनीति में सत्ता का विकल्प बनने से पहले जनता के बीच विपक्ष का भरोसा जीतना पड़ता है।
तो आखिर किस पर दबाव बढ़ा?
अब शीर्षक के सवाल पर लौटिए— प्रशांत किशोर की जीत से सत्ता पक्ष पर दबाव जरूर बढ़ा है। लेकिन उससे भी बड़ा दबाव उस विपक्ष पर है, जिसे अब अपने सामने एक नई चुनौती दिखाई दे सकती है। कल तक विपक्ष के सामने सवाल था—सरकार को कैसे घेरा जाए? अब उसके सामने एक दूसरा सवाल भी है—
अगर कोई और सरकार को उससे ज्यादा प्रभावी ढंग से घेरने लगे तो?
यही वह बिंदु है जहां प्रशांत किशोर की एक सीट बिहार की राजनीति में बड़ी कहानी बन जाती है। अगर वे विधानसभा में निर्भीक, तथ्यपरक और लगातार सक्रिय रहे, तो आज वे विपक्ष की भूमिका का विकल्प बन सकते हैं। और अगर जनता ने उन्हें उस भूमिका में स्वीकार कर लिया, तो कल वही स्वीकार्यता उन्हें सरकार के विकल्प के रूप में भी खड़ा कर सकती है।
इसलिए प्रशांत किशोर की जीत से सबसे ज्यादा दबाव शायद सरकार पर नहीं, विपक्ष पर है। सरकार के पास सत्ता है, संसाधन हैं और जवाब देने की पूरी व्यवस्था है। विपक्ष के पास जनता का भरोसा होना चाहिए। और अगर वह भरोसा किसी नए चेहरे की ओर खिसकने लगे, तो यह किसी भी स्थापित विपक्ष के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चेतावनी होती है।
प्रशांत किशोर की जीत इसलिए केवल एक सीट की जीत नहीं है। यह बिहार के विपक्ष के सामने खड़ा हुआ एक सवाल है—क्या वह अपनी भूमिका खुद मजबूत करेगा, या कोई दूसरा आकर उसकी जगह भर देगा?





