अभय वाणीः भोजपुरी में एक कहावत है— “चाम के बेर्हा, कुकुर रखवार”। यानी जिस चीज़ की हिफाज़त सबसे ज़्यादा जरूरी हो, उसकी जिम्मेदारी उसी को सौंप दी जाए जिस पर भरोसा ही न हो। भरत तिवारी के कथित एनकाउंटर मामले में आज यही कहावत कई लोगों के मन में कौंध रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस पुलिस टीम पर खुद सवाल खड़े हों, क्या उसी तंत्र के सहारे सच तक पहुंचा जा सकता है? यही वह बिंदु है जहां भरत तिवारी के कथित एनकाउंटर की जांच को लेकर जनता के मन में संदेह गहराने लगता है।
इतनी जल्दी हरकत में क्यों आई सरकार?
घटना के तुरंत बाद इलाके में तनाव बढ़ा, लोगों में आक्रोश दिखा और सवाल तेज़ी से उठने लगे। बढ़ते दबाव के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आनन-फानन में न्यायिक जांच की सिफारिश कर दी। बाद में इस सिफारिश को कैबिनेट की मंजूरी भी मिल गई और आयोग ने पटना उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति विनोद कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में जांच प्रक्रिया शुरू कर दी। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि सरकार ने मामले की गंभीरता को स्वीकार किया।
लेकिन किसी भी न्यायिक जांच की असली मजबूती केवल उसके गठन में नहीं, बल्कि उन आधारभूत तथ्यों और शुरुआती रिकॉर्ड में होती है जिन पर उसकी पूरी पड़ताल टिकी होती है। यहीं से यह मामला जटिल हो जाता है।
जब FIR हो गई, तो व्यवस्था जस की तस क्यों है?
बाद में SDPO समेत पांच पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR भी दर्ज हुई। यह दर्शाता है कि सरकार ने प्रथम दृष्टया मामले की गंभीरता को स्वीकार किया है। लेकिन इसके समानांतर एक और तथ्य चर्चा में है—जिले के पुलिस कप्तान मिस्टर राज अब भी अपने पद पर बने हुए हैं और जांच में प्रशासनिक सहयोग की भूमिका में हैं। यही वह बिंदु है जहां सवाल खड़े होने लगते हैं।
क्या पुलिस जो कह रही है वही पूरी सच्चाई है?
पुलिस का कहना है कि एनकाउंटर परिस्थितिजन्य कार्रवाई थी और पूरी प्रक्रिया कानून के दायरे में हुई। यह दावा भी जांच का एक अहम हिस्सा है। लेकिन जब आरोप और पुलिस का पक्ष आमने-सामने हों, तब सच तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता निष्पक्ष और पारदर्शी जांच ही होता है।
मामला अब सिर्फ स्थानीय नहीं रह गया है
इस मामले में जिले के पुलिस कप्तान की भूमिका को लेकर सवाल केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहे हैं। प्रधानमंत्री के पूर्व निजी सुरक्षा अधिकारी रहे लकी बिस्ट और पूर्व सांसद तथा जदयू के वरिष्ठ नेता अरुण कुमार भी सार्वजनिक रूप से इस मामले में निष्पक्ष जांच की आवश्यकता और पुलिस तंत्र की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं।
वहीं भरत तिवारी के छोटे भाई चंदन ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं। चंदन का दावा है कि उन्हें केस को आगे न बढ़ाने और विवाद को खत्म करने को लेकर दबाव और धमकियां दी गईं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और पुलिस या प्रशासन की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है, लेकिन ऐसे दावों ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
अगर इन आरोपों में जरा भी सच्चाई है, तो यह केवल एक एनकाउंटर जांच का विषय नहीं रह जाता, बल्कि गवाहों और पीड़ित पक्ष की सुरक्षा का प्रश्न भी बन जाता है।
क्या जांच सच में प्रभावमुक्त रह पाएगी?
मामला केवल किसी एक अधिकारी की पोस्टिंग का नहीं है; यह पूरी जांच की विश्वसनीयता का सवाल है। जिले का पुलिस कप्तान प्रशासनिक रूप से पूरे तंत्र का प्रमुख होता है। केस डायरी, वायरलेस लॉग, हथियारों का रिकॉर्ड, ड्यूटी चार्ट, कॉल डिटेल्स और शुरुआती घटनास्थल की रिपोर्ट—इन सबका नियंत्रण उसी तंत्र के भीतर होता है।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या जांच के दौरान अधीनस्थ अधिकारी पूरी स्वतंत्रता से बयान दे पाएंगे? क्या गवाह बिना किसी मनोवैज्ञानिक दबाव के सामने आ पाएंगे? और क्या दस्तावेजों की निष्पक्षता पर जनता बिना संदेह भरोसा कर पाएगी? यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता तय करेगा।
क्या न्याय होता हुआ दिख भी रहा है?
कानून का एक स्थापित सिद्धांत है— “Justice must not only be done, but must also be seen to be done.” यानी न्याय केवल होना पर्याप्त नहीं है, उसका निष्पक्ष दिखना भी उतना ही जरूरी है।
भरत तिवारी मामले में यही कसौटी सबसे महत्वपूर्ण बन गई है। अगर जिस तंत्र पर आरोप हैं, उसी का शीर्ष ढांचा यथावत बना रहता है, तो भले जांच निष्पक्ष हो, जनता के मन में संदेह बने रहने की संभावना खत्म नहीं होती।
इतिहास से उठती आशंकाएं
देश में ऐसे कई मामलों में देखा गया है कि जब जांच उसी संस्थागत ढांचे के प्रभाव में हुई जिस पर आरोप थे, तो बाद में सबूत कमजोर पड़े, गवाह बदले या प्रक्रिया पर सवाल उठे।
यह जरूरी नहीं कि हर मामले में ऐसा ही हो, लेकिन इतिहास यही बताता है कि पारदर्शिता जितनी मजबूत होगी, निष्कर्ष पर भरोसा उतना ही बढ़ेगा। यही वजह है कि भरत तिवारी मामले में भी जनता के भीतर आशंका बनी हुई है।
निष्पक्ष जांच के लिए क्या इतना काफी है?
कानूनी और प्रशासनिक परंपराओं में अक्सर यह माना जाता है कि जिन अधिकारियों की भूमिका सवालों के घेरे में हो, उन्हें जांच अवधि तक अलग रखना या स्थानांतरित करना जांच की निष्पक्षता को मजबूत करता है।
यह किसी को दोषी ठहराने का कदम नहीं होता, बल्कि जांच को हर तरह के प्रभाव से मुक्त रखने का संस्थागत उपाय माना जाता है। इसी मांग को लेकर अब समाज के एक बड़े हिस्से की निगाहें सरकार और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं।
अंतिम सवाल- क्या इस जांच का अंजाम भरोसेमंद होगा?
यह स्पष्ट है कि न्यायिक जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जांच की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी, स्वतंत्र और ईमानदार होगी, उसका परिणाम उतना ही स्वीकार्य होगा। क्योंकि जांच तभी न्याय तक पहुंचती है, जब उसका रास्ता सही हो और सहयोग निष्पक्ष हो।
भरत तिवारी को न्याय मिलेगा या नहीं, यह समय तय करेगा। लेकिन मौजूदा परिस्थितियां यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि क्या जांच का ढांचा इतना स्वतंत्र है कि उसका नतीजा बिना किसी संदेह के स्वीकार किया जा सके? क्योंकि जब जांच के घेरे में खुद जांच का ढांचा आ जाए, तब सच से पहले भरोसा मरता है—और शायद यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी चिंता है। और तब फिर वही पुरानी कहावत कानों में गूंजती है— “चाम के बेर्हा, कुकुर रखवार।”
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