Sunday, February 22, 2026

सजल चक्रवर्ती: प्रतिभा से पतन तक – एक तेज-तर्रार IAS की अधूरी कहानी

-Advertise with US-

पटनाः कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही होती है कि जो व्यक्ति अपनी प्रतिभा और परिश्रम से ऊँचाइयों तक पहुँचता है, वही एक चूक के कारण अपयश और एकाकीपन की अँधेरी सुरंग में खो जाता है। सजल चक्रवर्ती (Sajal Chakraborty) की कहानी ऐसी ही एक त्रासद दास्तान है-एक मेधावी छात्र, तेजतर्रार पत्रकार और भारतीय प्रशासनिक सेवा तक पहुँचे अधिकारी की, जिसका अंत गहरे अकेलेपन में हुआ।

मेधा, बेचैनी और रास्ते की तलाश

रांची के प्रतिष्ठित St. Xavier’s School, Ranchi में पढ़ते हुए ही Sajal Chakraborty ने अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दे दिया था। पिता और भाई सेना में बड़े अधिकारी थे। परिवार चाहता था कि वे भी सैन्य सेवा में जाएँ। उनका चयन Rashtriya Indian Military College में हुआ-जो किसी भी छात्र के लिए गर्व का विषय होता है।

लेकिन सजल चक्रवर्ती का स्वभाव परंपरागत ढाँचे में बंधने वाला नहीं था। अनुशासन की सख्ती और मन की चंचलता के बीच सामंजस्य नहीं बैठ पाया। वे पढ़ाई बीच में छोड़कर लौट आए।

इसके बाद वे पुणे गए, जहाँ पढ़ाई के साथ-साथ अखबारों में काम करने लगे। लेखनी में धार थी और दृष्टि में पैनी सामाजिक समझ। कुछ समय बाद वे रांची लौटे और St. Xavier’s College, Ranchi से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसी दौरान अंग्रेज़ी दैनिक New Republic में रिपोर्टर के रूप में काम करते हुए उनकी रिपोर्टिंग चर्चा में आ गई।

- Advertisement -

पत्रकार से प्रशासनिक अधिकारी तक

पत्रकारिता के दौरान ही उनके भीतर यह भावना मजबूत हुई कि व्यवस्था पर केवल लिखना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर जाकर उसे बदलने की कोशिश करनी चाहिए। यही विचार उन्हें सिविल सेवा परीक्षा की ओर ले गया।

सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा दी। अपनी बौद्धिक क्षमता और व्यापक अध्ययन के बल पर वे सफल हुए और 1979 बैच में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के लिए चयनित हुए। उन्हें तत्कालीन अविभाजित बिहार कैडर मिला।

- Advertisement -

प्रशिक्षण के बाद उन्होंने विभिन्न जिलों में प्रशासनिक पदों पर कार्य किया। तेज दिमाग, त्वरित निर्णय क्षमता और स्पष्टवादिता के कारण वे अपने समकक्ष अधिकारियों में अलग पहचान रखते थे।

सत्ता, दाग और अदालत

लेकिन प्रशासनिक सेवा का यह उजला अध्याय ज्यादा लंबा नहीं चला। 1990 के दशक में अविभाजित बिहार के पशुपालन विभाग में व्यापक वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ। बाद में यही मामला देशभर में ‘चारा घोटाले’ के नाम से चर्चित हुआ।

चाईबासा कोषागार से करोड़ों रुपये की अवैध निकासी इसी घोटाले का हिस्सा थी। फर्जी बिलों, काल्पनिक आपूर्तिकर्ताओं और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए खर्च के आधार पर सरकारी खजाने से धन निकाला गया। जाँच एजेंसियों ने पाया कि यह केवल विभागीय स्तर की गड़बड़ी नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक निगरानी की गंभीर विफलता भी थी।

सजल चक्रवर्ती उस समय प्रशासनिक जिम्मेदारी वाले पद पर तैनात थे। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि उनके कार्यकाल में अवैध निकासी हुई और बतौर वरिष्ठ अधिकारी वे इसे रोकने या प्रभावी आपत्ति दर्ज करने में विफल रहे। अदालत ने माना कि प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित सतर्कता नहीं बरती गई।

इसी प्रकरण में लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) सहित कई अन्य आरोपियों को भी सजा सुनाई गई। सजल चक्रवर्ती को भी दोषी ठहराया गया।

यह केवल कानूनी फैसला नहीं था; यह उनकी सार्वजनिक प्रतिष्ठा पर लगा गहरा दाग था। जिस व्यक्ति ने जीवन भर बौद्धिक उत्कृष्टता का परिचय दिया, वह अचानक आरोपों और अपमान के घेरे में खड़ा था।

निजी जीवन का विघटन और एकाकी अंत

व्यक्तिगत जीवन भी उन्हें सहारा नहीं दे सका। दो विवाह हुए-दोनों असफल रहे। कोई संतान नहीं थी। माता-पिता और भाई का पहले ही निधन हो चुका था। अपमान, मुकदमे और सामाजिक दूरी ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। बीमारी ने घेरा, मानसिक अवसाद ने जकड़ लिया। 2020 में जब उनका निधन हुआ, वे जमानत पर बाहर थे। अंतिम समय में वे लगभग अकेले थे। न परिवार का साथ, न सामाजिक जीवन की वह भीड़, जो कभी उनके आसपास रहा करती थी।

एक अधूरी विरासत

सजल चक्रवर्ती की कहानी केवल एक व्यक्ति के उत्थान, पतन और विफलता की कथा नहीं है; यह इस सच का आईना भी है कि प्रतिभा और पद भी जीवन की जटिलताओं से रक्षा नहीं कर पाते।

उन्होंने जीवन के हर मोड़ पर नई राह चुनने का साहस दिखाया-चाहे सैन्य करियर छोड़ना हो, पत्रकारिता अपनाना हो या प्रशासनिक सेवा में जाना। लेकिन एक घोटाले की छाया ने उनके पूरे व्यक्तित्व को ढक लिया।

उनका जीवन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि सफलता का असली अर्थ क्या है-पद और प्रतिष्ठा, या संतुलित और नैतिक जीवन?

एक मेधावी मस्तिष्क, जो कभी व्यवस्था बदलने का सपना देखता था, अंततः अपने ही जीवन के बोझ से दब गया। यही इस कहानी की सबसे बड़ी त्रासदी है।

- Advertisement -
अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेय
आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।

Related Articles

-Advertise with US-

लेटेस्ट न्यूज़

Intagram

108 Followers
Follow