पटनाः लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता और केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान का पॉलिटिकल विजन – “बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” – लंबे समय से उनकी पहचान का मुख्य आधार रहा है। यह नारा केवल चुनावी मंचों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बिहार को विकास की प्राथमिकता देने के वादे के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। अब, केंद्र सरकार में मंत्री की भूमिका निभाते हुए यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या “Bihar First, Bihari First” विजन मंत्रालय की नीतियों और फैसलों में जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहा है।
कृषि प्रधान राज्य से वैल्यू एडिशन की ओर
बिहार कृषि उत्पादन के मामले में समृद्ध राज्य है, लेकिन लंबे समय तक यहाँ खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का ढांचा कमजोर रहा है। हाल के समय में जो नीतिगत रुझान दिखाई देता है, वह इस कमी को दूर करने की दिशा में एक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। मंत्रालय की सोच इस ओर जाती दिखती है कि कृषि उपज को कच्चे रूप में राज्य से बाहर भेजने के बजाय उसका प्रसंस्करण बिहार में ही हो, ताकि मूल्य संवर्धन यहीं हो और किसानों तथा स्थानीय युवाओं को अधिक आर्थिक लाभ मिल सके। यह दिशा “बिहार फर्स्ट” के आर्थिक अर्थ से मेल खाती है, हालांकि नीतिगत मंशा और जमीनी परिणामों के बीच की दूरी अब भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है।
सूक्ष्म खाद्य उद्योगों को संगठित करने की पहल
राज्य में छोटे और घरेलू स्तर पर चल रहे खाद्य व्यवसायों को औपचारिक ढांचे से जोड़ने की कोशिशें भी सामने आई हैं। अचार, मसाले, मखाना, सत्तू, आटा और पारंपरिक खाद्य उत्पाद बनाने वाले ग्रामीण उद्यमियों को पंजीकरण, प्रशिक्षण और वित्तीय प्रणाली से जोड़ने की पहलें हुई हैं। इससे महिला समूहों और स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी बढ़ने के संकेत मिले हैं और कुछ स्थानों पर घरेलू उत्पादन गतिविधियाँ छोटे व्यवसायों में बदलती दिखी हैं। फिर भी बड़ी चुनौती बाजार से सीधा जुड़ाव, ब्रांडिंग और नियमित सप्लाई चेन की है। प्रशिक्षण और शुरुआती सहायता के बावजूद कई इकाइयाँ बड़े बाजार में टिकाऊ जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ढांचा बन रहा है, लेकिन व्यापक औद्योगिक परिवर्तन अभी दूर है।
स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग की कोशिश
बिहार के विशिष्ट उत्पादों जैसे मखाना, शाही लीची, जर्दालू आम, केला, मक्का और कतरनी चावल को पहचान दिलाने की दिशा में भी कोशिशें दिखाई दी हैं। इन उत्पादों की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और बेहतर बाजार तक पहुँच की बात की जा रही है। विशेष रूप से मखाना को संभावनाशील उत्पाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हालांकि समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो सवाल यह भी है कि क्या ये प्रयास अभी प्रतीकात्मक और सीमित दायरे तक हैं, या वास्तव में बड़े पैमाने पर निर्यात और संगठित ब्रांडिंग की मजबूत संरचना विकसित हो रही है। गुणवत्ता प्रमाणन, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पैकेजिंग और स्थिर निर्यात ढांचे के क्षेत्र में अभी काफी काम बाकी माना जाता है।
निवेश और बुनियादी ढांचे की वास्तविक स्थिति
निवेश के मोर्चे पर बिहार को खाद्य प्रसंस्करण के लिए संभावनाशील राज्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर स्थापित प्रसंस्करण हब की संख्या अभी सीमित है। कोल्ड चेन, भंडारण और लॉजिस्टिक्स का ढांचा कई जिलों में अब भी कमजोर है। निजी निवेशकों की रुचि की चर्चा जरूर है, लेकिन व्यापक औद्योगिक निवेश की रफ्तार अभी तेज नहीं कही जा सकती। इससे यह संकेत मिलता है कि नीतिगत रुचि मौजूद है, पर उसे मजबूत औद्योगिक संरचना में बदलने की प्रक्रिया अभी शुरुआती या मध्यम चरण में है।
कौशल विकास और युवाओं की भागीदारी
कौशल विकास के क्षेत्र में भी खाद्य प्रसंस्करण को नए अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इस सेक्टर में गुणवत्ता नियंत्रण, फूड सेफ्टी और आधुनिक पैकेजिंग जैसी विशेषज्ञताओं की जरूरत है, और युवाओं को इन क्षेत्रों से जोड़ने की सोच सामने आई है। लेकिन विशेषीकृत प्रशिक्षण संस्थानों की सीमित पहुँच और स्थानीय स्तर पर उद्योगों की कम उपलब्धता के कारण प्रशिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर पैदा होने में अभी समय लग सकता है। जब तक उद्योग विस्तार समान गति से नहीं होता, कौशल विकास का प्रभाव भी सीमित रह सकता है।
ग्रामीण आय और रोजगार पर असर
“बिहारी फर्स्ट” के सामाजिक अर्थ को देखें तो सबसे बड़ा पैमाना ग्रामीण परिवारों की आय और रोजगार है। स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयाँ बढ़ने से किसानों को बेहतर मूल्य मिलने और ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोजगार बढ़ने की उम्मीद की जाती है। शुरुआती स्तर पर ऐसे संकेत जरूर मिलते हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर आय संरचना में बड़ा बदलाव अभी स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। कई जगह प्रसंस्करण गतिविधियाँ अभी परियोजना या सीमित पैमाने तक ही सिमटी हुई हैं।
विजन बनाम जमीनी असर
समग्र रूप से देखें तो चिराग पासवान के मंत्रालय की नीति दिशा में बिहार के कृषि संसाधनों, सूक्ष्म उद्यमों और पारंपरिक उत्पादों पर ध्यान जरूर दिखाई देता है, जो उनके घोषित विजन से मेल खाता है। लेकिन किसी भी विजन की सफलता केवल केंद्रीय नीतियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि राज्य स्तर पर उसकी राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमता भी मायने रखती है।
राज्य की सत्ता में हिस्सेदारी, विजन को कितना बल?
इसी संदर्भ में बिहार में LJP (Ramvilas) की राजनीतिक स्थिति भी उल्लेखनीय है। राज्य विधानसभा में पार्टी के 19 विधायक हैं और वह सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है। राज्य सरकार में पार्टी के दो मंत्री गन्ना उद्योग और लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) जैसे अहम विभाग संभाल रहे हैं। ऐसे में “बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” का विजन केवल केंद्रीय स्तर की घोषणाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके राज्य स्तर पर लागू होने की संभावनाओं और राजनीतिक आधार को भी दर्शाता है। फिर भी, इस राजनीतिक उपस्थिति के बावजूद जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर औद्योगिक बदलाव की रफ्तार अभी मध्यम ही मानी जा रही है।
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“बिहार फर्स्ट” नीतियों की दिशा और फोकस में झलकता है, लेकिन “बिहारी फर्स्ट” का वास्तविक अर्थ – व्यापक रोजगार, स्थिर आय वृद्धि और मजबूत प्रसंस्करण उद्योग – अभी आंशिक रूप से ही साकार होता दिख रहा है।
शुरुआत हुई है, परिणाम अभी बाकी
यह दौर एक शुरुआत का संकेत देता है, जहाँ बिहार को खाद्य प्रसंस्करण के नक्शे पर अधिक प्रमुखता दिलाने की कोशिश हो रही है। लेकिन इस विजन की असली परीक्षा आने वाले वर्षों में होगी, जब यह साफ होगा कि नीतिगत प्राथमिकताएँ कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से जमीनी उद्योग, रोजगार और आर्थिक बदलाव में बदल पाती हैं।
