NEET छात्रा केस में CBI की एंट्री! बिहार के पुराने मामलों से उठते नए सवाल

अभय पाण्डेय

अभय वाणीः बिहार में जब भी कोई बड़ा और संवेदनशील अपराध सामने आता है, खासकर ऐसा जिसमें किसी युवती या छात्रा की संदिग्ध मौत हो, तो माहौल दो हिस्सों में बंट जाता है-उम्मीद और आशंका। उम्मीद इस बात की कि सच सामने आएगा, और आशंका इस डर की कि मामला भीड़, राजनीति और लंबी जांच की धूल में कहीं गुम न हो जाए। पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में NEET की तैयारी कर रही एक छात्रा की संदिग्ध मौत और इस मामले को CBI जांच के लिए भेजने की सिफारिश ने बिहार को फिर उसी पुराने मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

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यह सिर्फ एक केस नहीं है, बल्कि उन अनगिनत सवालों की वापसी है जो इससे पहले भी कई बार उठे-और जिनके जवाब आज तक पूरी तरह संतोषजनक नहीं माने गए।

शंभू गर्ल्स हॉस्टल केस: सवाल जो थम नहीं रहे

पटना के एक गर्ल्स हॉस्टल में रह रही NEET अभ्यर्थी की संदिग्ध हालात में मौत ने शुरुआत से ही कई संदेह पैदा किए। परिजनों ने इसे सामान्य मौत मानने से इनकार किया और यौन उत्पीड़न व साजिश की आशंका जताई। शुरुआती पुलिस कार्रवाई, घटनास्थल की स्थिति, हॉस्टल प्रबंधन की भूमिका और सबूतों को संभालने के तरीके पर भी सवाल उठे।

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जैसे-जैसे मामला तूल पकड़ता गया, छात्र संगठनों, सामाजिक समूहों और राजनीतिक दलों ने निष्पक्ष जांच की मांग तेज कर दी। अंततः राज्य सरकार ने मामले की जांच CBI को सौंपने की सिफारिश कर दी। लेकिन यहीं से एक पुरानी बहस फिर जिंदा हो गई-क्या CBI जांच का मतलब सचमुच न्याय की गारंटी है?

पुराने केस, वही पैटर्न

शिल्पी–गौतम मामला (1999)

पटना में दो युवाओं-शिल्पी जैन और गौतम सिंह-की संदिग्ध मौत ने उस दौर में बिहार को झकझोर दिया था। उनकी लाशें एक कार में मिली थीं। शुरुआत में इसे आत्महत्या बताया गया, लेकिन कई परिस्थितियों और फोरेंसिक संकेतों ने शक को गहरा किया। मामला CBI को सौंपा गया।

लंबी जांच के बाद भी जो निष्कर्ष सामने आए, उनसे परिवार और समाज का एक बड़ा वर्ग संतुष्ट नहीं हुआ। आरोप लगे कि कई सवाल अनुत्तरित रह गए-क्या दोनों ने सच में आत्महत्या की थी? क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका थी?

आज भी यह केस अक्सर इस उदाहरण के तौर पर लिया जाता है कि CBI जांच के बाद भी हर सच्चाई साफ-साफ सामने आ ही जाए, यह जरूरी नहीं।

नवरुणा चक्रवर्ती कांड (2012)

मुज़फ़्फ़रपुर की 12 साल की नवरुणा चक्रवर्ती केस बिहार के सबसे दर्दनाक मामलों में गिना जाता है। घर से रहस्यमय तरीके से गायब हुई बच्ची की संदिग्ध मौत का मामला पहले स्थानीय पुलिस के पास रहा, लेकिन जांच की दिशा और गति पर सवाल उठे। बाद में मामला CBI को सौंपा गया।

CBI ने कई कोणों से जांच की, कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन सालों की पड़ताल के बाद भी ऐसा ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आ सका जिससे परिवार को न्याय का अहसास हो। अंततः जब जांच लगभग ठहर सी गई, तो लोगों के मन में यह सवाल और गहरा हो गया-इतनी बड़ी एजेंसी भी अगर सच्चाई तक नहीं पहुंच पा रही, तो आम नागरिक किस पर भरोसा करे?

मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम केस (2018)

यह मामला अलग तरह का था, लेकिन उतना ही भयावह। बालिका गृह में रह रही बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न की खबर ने पूरे देश को हिला दिया। मामला जब सामने आया तो राज्य स्तर की जांच पर भरोसा कम दिखा, और अंततः CBI ने जांच संभाली। अदालतों की निगरानी में केस आगे बढ़ा और कई आरोपियों को सजा भी हुई।

यह उन गिने-चुने मामलों में रहा, जहां केंद्रीय जांच एजेंसी की भूमिका से लोगों को लगा कि दबे हुए सच बाहर आ सकते हैं। लेकिन इसके साथ यह भी साफ हुआ कि ऐसे मामलों में मीडिया, न्यायपालिका और जनदबाव की भूमिका भी बेहद अहम होती है।

बड़े मामलों में CBI पर ही भरोसा क्यों?

CBI जांच की मांग आम तौर पर चार वजहों से उठती है:
  • स्थानीय पुलिस पर भरोसे की कमी
  • राजनीतिक दबाव या प्रभावशाली लोगों की भूमिका का संदेह
  • सबूतों से छेड़छाड़ या लापरवाही की आशंका
  • मामले का सामाजिक और भावनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील होना

CBI को अक्सर “निष्पक्ष” एजेंसी के रूप में देखा जाता है, जो राज्य के प्रभाव से कुछ हद तक दूर मानी जाती है। लेकिन अनुभव यह भी बताता है कि CBI के पास मामला चला जाना ही न्याय की गारंटी नहीं है। जांच लंबी खिंच सकती है, सबूत कमजोर पड़ सकते हैं, और अंत में कानूनी कसौटी पर केस टिक ही जाए, यह भी तय नहीं।

NEET छात्रा केस: इतिहास की छाया

इस नए मामले में भी वही डर बार-बार सामने आ रहा है-क्या यह केस भी सालों तक फाइलों में घूमता रहेगा? क्या परिवार को साफ जवाब मिल पाएगा? क्या दोषियों तक कानून पहुंच पाएगा, चाहे वे कितने भी प्रभावशाली क्यों न हों?

साथ ही एक उम्मीद भी है-कि अगर जांच पेशेवर तरीके से, तकनीकी सबूतों, डिजिटल डेटा, फोरेंसिक विश्लेषण और गवाहों की सुरक्षा के साथ आगे बढ़ी, तो यह केस एक मिसाल भी बन सकता है।

यह मामला अब सिर्फ एक छात्रा की मौत की जांच नहीं रहा। यह बिहार में छात्रावासों की सुरक्षा, बेटियों की सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता की सामूहिक परीक्षा बन चुका है।

फाइलों से फैसलों तक: न्याय की असली चुनौती

बिहार का इतिहास बताता है कि हर हाई-प्रोफाइल अपराध के बाद CBI जांच की मांग उठती है, लेकिन न्याय की राह सिर्फ एजेंसी बदलने से आसान नहीं होती। असली फर्क पड़ता है- सबूतों की ईमानदार सुरक्षा से, जांच की पारदर्शिता से, राजनीतिक हस्तक्षेप से दूरी से और अदालत में मजबूत पैरवी से।

शंभू गर्ल्स हॉस्टल की NEET छात्रा का मामला आज उसी चौराहे पर खड़ा है, जहां पहले भी कई केस खड़े रहे हैं। फर्क बस इतना है कि हर बार की तरह इस बार भी बिहार देख रहा है-क्या इस बार सच सचमुच अंत तक जाएगा, या फिर एक और फाइल इतिहास के अधूरे पन्नों में जुड़ जाएगी।

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आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।