सियासी चुप्पी की शर्मनाक परंपरा: UGC से पटना हॉस्टल कांड तक सवालों से भागते नेता

अभय पाण्डेय

अभय वाणीः देश के राजनीतिक गलियारों में आम जनता के संवेदनशील सवालों पर जवाबदेही देने की परंपरा लगातार खोखली होती जा रही है। UGC विवाद और पटना के शम्भु गर्ल्स हॉस्टल कांड में नेताओं और प्रशासन की चुप्पी ने यह साबित कर दिया कि सत्ता की सुरक्षा अक्सर जनता के न्याय की अपेक्षाओं से ऊपर रखी जाती है।

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UGC विवाद: जवाबदेही का अभाव

UGC equity regulation 2026 पर विवाद गहराता देख जब पत्रकारों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं से जवाब मांगा, तो उन्होंने सवालों से बचते हुए मौके से निकलना ही बेहतर समझा। यह घटना राजनीतिक गलियारों में जवाबदेही की कमी को उजागर करती है।

पटना हॉस्टल कांड: सुरक्षा और न्याय पर सवाल

पटना के शम्भु गर्ल्स हॉस्टल में एक युवती की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने पूरे शहर को हिला दिया। छात्रों और परिवारों की न्याय की मांग के बावजूद सरकार और पुलिस-प्रशासन का रवैया उदासीन रहा। सुरक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी और मामले में ठोस कार्रवाई में देरी ने सवाल और बढ़ा दिए।

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भाजपा कोटे से बिहार सरकार में मंत्री बनी श्रेयसी सिंह से जब पत्रकारों ने दिवंगत युवती के न्याय पर सवाल पूछा, तो उन्होंने बिना जवाब दिए मौन साधकर वहां से निकलना ही चुना। वीडियो शोसल मीडिया पर वायरल है जो दिखाता है कि संवेदनशील मामलों में राजनीतिक नेतृत्व कैसे सवालों से बचने को प्राथमिकता देता है।

विश्लेषकों की राय: लोकतंत्र पर संकट

विश्लेषक कहते हैं कि यह मौन केवल सत्ता की सुरक्षा की रणनीति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है। जनता के सवालों का जवाब न देना न केवल सामाजिक विश्वास को तोड़ता है, बल्कि प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

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डिजिटल मीडिया में तीव्र प्रतिक्रिया

UGC विवाद और पटना हॉस्टल कांड – दोनों में नेताओं और प्रशासन की मौन रणनीति सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन चुकी है। जनता लगातार पूछ रही है: क्या संवेदनशील मुद्दों पर चुप रहना ही राजनीतिक नेतृत्व की नई आदत बन गई है?

चुप्पी की राजनीति का बढ़ता खतरा

UGC से लेकर पटना हॉस्टल तक, यह चुप्पी दर्शाती है कि बहस और जवाबदेही की बजाय मौन अब राजनीति की पहली भाषा बन चुकी है। सवाल उठता है कि जब संवेदनशील मुद्दों पर नेता और प्रशासन जवाब नहीं देते, तो न्याय और लोकतंत्र की उम्मीद किसे रहेगी?

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आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।