कानून के नाम पर वर्चस्व की जंग: ED बनाम पुलिस, रांची से कोलकाता तक लोकतंत्र की परीक्षा

अभय पाण्डेय

रांचीः प्रवर्तन निदेशालय (ED) और झारखंड पुलिस (Jharkhand Police) के बीच रांची में हुआ आमना-सामना किसी एक शिकायत या एक कार्यालय की तलाशी भर नहीं है। यह घटना भारतीय लोकतंत्र के उस संवेदनशील मोड़ को उजागर करती है, जहाँ कानून के नाम पर चलने वाली संस्थाएँ खुद सवालों के घेरे में आ खड़ी होती हैं और सत्ता के अलग-अलग केंद्र आमने-सामने दिखाई देने लगते हैं।

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जब केंद्रीय एजेंसी को अपने ही दफ्तर में सुरक्षा मांगनी पड़ी

जिस ED को देश में आर्थिक अपराधों के खिलाफ सबसे कठोर हथियार माना जाता रहा है, वही एजेंसी आज अपने ही दफ्तर में सुरक्षा बल बुलाने को मजबूर दिखी। यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कहता है। आरोप एक साधारण नहीं हैं। एक सरकारी कर्मचारी यह दावा कर रहा है कि पूछताछ के दौरान उसे बंद कमरे में पीटा गया, सिर फोड़ दिया गया और जबरन अपराध स्वीकार कराने की कोशिश हुई। ये आरोप सही हैं या नहीं, यह अदालत तय करेगी, लेकिन इतना तो तय है कि इस तरह के आरोप किसी भी संवैधानिक संस्था के लिए बेहद गंभीर होते हैं।

शिकायत, एफआईआर और राज्य पुलिस की संवैधानिक मजबूरी

दूसरी तरफ Jharkhand Police की कार्रवाई को केवल राजनीतिक बदले की भावना कहकर खारिज करना भी आसान नहीं है। किसी नागरिक की शिकायत पर एफआईआर दर्ज होना और उसकी जांच करना राज्य पुलिस का संवैधानिक दायित्व है। यदि आरोप केंद्रीय एजेंसी के अधिकारी पर है, तो भी कानून की प्रक्रिया रुक नहीं सकती। यही संघीय ढांचे की बुनियाद है कि कोई भी संस्था कानून से ऊपर नहीं होती।

कानून से आगे का सवाल: भरोसे की दरार

लेकिन सवाल यहां सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का नहीं है, सवाल भरोसे का है। पिछले कुछ वर्षों में ईडी की कार्रवाइयों ने यह धारणा मजबूत की है कि उसकी सक्रियता विपक्ष शासित राज्यों में कहीं अधिक दिखती है। झारखंड हो या पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र हो या दिल्ली, केंद्रीय एजेंसियों की मौजूदगी अक्सर राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में दिखाई देती है। इसी पृष्ठभूमि में जब झारखंड पुलिस ईडी कार्यालय में दाखिल होती है, तो उसे केवल एक जांच कार्रवाई के रूप में देखना लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है।

कोलकाता से रांची तक: टकराव की बनती हुई लकीर

झारखंड का यह मामला अलग-थलग नहीं है। कुछ ही समय पहले कोलकाता में भी प्रवर्तन निदेशालय और राज्य प्रशासन के बीच गंभीर टकराव देखने को मिला था। संदेशखाली और उससे जुड़े मामलों में ईडी की कार्रवाई के दौरान राज्य पुलिस और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठे, बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची और केंद्र ने राज्य सरकार पर एजेंसी के काम में बाधा डालने के आरोप लगाए। उस प्रकरण में भी यही तर्क सामने आया था कि क्या केंद्रीय एजेंसियां कानून के तहत काम कर रही हैं या राजनीतिक लड़ाई का औजार बनती जा रही हैं।

पहले भी हुआ है, फर्क बस इतना है कि अब खुलकर हो रहा है

दरअसल यह पहली बार नहीं है जब किसी राज्य में ईडी और स्थानीय प्रशासन आमने-सामने आए हों। इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में ईडी अधिकारियों पर कथित हमले, पुलिस की निष्क्रियता और फिर केंद्रीय हस्तक्षेप जैसे हालात बन चुके हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि तब टकराव परोक्ष था, अब प्रत्यक्ष है। रांची में राज्य पुलिस का सीधे ईडी दफ्तर में दाखिल होना इस बात का संकेत है कि केंद्र और राज्यों के बीच संस्थागत टकराव अब दबे शब्दों में नहीं, खुले मैदान में लड़ा जा रहा है

क्या यह सिर्फ जांच है या सत्ता की जवाबी राजनीति?

यह भी संयोग नहीं है कि जिस राज्य में यह टकराव हुआ, वहीं की चुनी हुई सरकार को गिराने की प्रक्रिया में ईडी की भूमिका को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में पुलिस की इस कार्रवाई को सत्ता की जवाबी राजनीति के चश्मे से देखा जाना स्वाभाविक है। यही वजह है कि यह मामला कानून और राजनीति के खतरनाक मिश्रण का प्रतीक बन गया है।

दोनों तरफ खतरा, लोकतंत्र बीच में

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस टकराव में संस्थाओं की साख दांव पर है। अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो ईडी जैसी एजेंसी की नैतिकता पर गहरा आघात लगेगा। और अगर आरोप झूठे निकलते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि राज्य सरकारें केंद्रीय एजेंसियों पर दबाव बनाने के लिए पुलिस तंत्र का इस्तेमाल कर सकती हैं। दोनों ही स्थितियाँ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।

संघीय संतुलन या खुला टकराव?

भारत का संघीय ढांचा सहयोग और संतुलन पर टिका है, टकराव पर नहीं। केंद्रीय एजेंसियों की स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन उतनी ही जरूरी उनकी जवाबदेही भी है। राज्य पुलिस का अधिकार क्षेत्र महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने के लिए हो, यह भी खतरनाक है।

रांची से उठती चेतावनी

रांची की यह घटना एक चेतावनी है। चेतावनी उन संस्थाओं के लिए, जो खुद को कानून से ऊपर समझने लगी हैं, और चेतावनी उन सरकारों के लिए भी, जो कानून को सत्ता संघर्ष का हथियार बना रही हैं। अब फैसला न्यायपालिका को करना है कि सच किस तरफ है, लेकिन लोकतंत्र के हित में यह ज़रूरी है कि यह लड़ाई कानून के दायरे में रहे, न कि शक्ति प्रदर्शन के अखाड़े में।

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आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।