अभय वाणीः बिहार की राजनीति में शब्द कभी-कभी शस्त्र से भी अधिक धारदार साबित होते हैं। “राजू तिवारी जी हैं कौन? ये वही राजू तिवारी हैं जो सामंतवादी, ब्राह्मणवादी, मनुवादी व्यवस्था के पोषक हैं।” राजद नेता अनिल कुमार साधु उर्फ साधु पासवान के इस बयान ने सीधे निशाना साधा लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रदेश अध्यक्ष और प्रमुख नेता राजू तिवारी पर।
यह बयान केवल एक व्यक्ति पर सवाल नहीं, बल्कि उस संगठनात्मक ढांचे पर भी था, जिसकी धुरी के रूप में राजू तिवारी को देखा जाता है। राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ी है, लेकिन तथ्य यह हैं कि संकट के दौर में पार्टी के लिए उनकी भूमिका निर्णायक रही।
संगठन की नसों में पकड़
लोजपा (रामविलास) में प्रदेश अध्यक्ष का पद केवल औपचारिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन का केंद्र है। राजू तिवारी को पार्टी के भीतर ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जिनकी पकड़ जिला से लेकर बूथ स्तर तक फैली हुई है। नियमित बैठकों, संगठन विस्तार अभियानों और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद ने उन्हें प्रदेश इकाई का सक्रिय चेहरा बना दिया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार जैसे जटिल सामाजिक समीकरण वाले राज्य में संगठन को जीवंत बनाए रखना आसान नहीं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष की सक्रियता सीधे तौर पर पार्टी के अस्तित्व और विस्तार से जुड़ी होती है।
संकट काल में ‘योद्धा’ की भूमिका
2020-21 का दौर पार्टी के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण समय था। राम विलास पासवान के निधन के बाद संगठन बिखरने लगा, कई नेता और कार्यकर्ता अलग राह पकड़ने लगे। उस समय राजू तिवारी को भी अन्य राजनीतिक विकल्पों के प्रस्ताव मिले थे।
लेकिन समर्थकों का कहना है कि उन्होंने उन सभी प्रस्तावों को नजरअंदाज कर चिराग पासवान का हाथ थामे रखा। एक पार्टी पदाधिकारी के शब्दों में, “जब लोग जा रहे थे, तब वे डटे रहे। उन्होंने सुविधा नहीं, संघर्ष चुना।”
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कई कार्यकर्ता उन्हें प्रतीकात्मक रूप से “चिराग का हनुमान” कहते हैं-एक ऐसा सहयोगी जो संकट में भी नेतृत्व के साथ खड़ा रहा। उन्होंने उस कठिन दौर में संगठन को संभालने में निर्णायक भूमिका निभाई और कार्यकर्ताओं को टूटने से रोका।
निष्ठा बनाम आरोपों की राजनीति
साधु पासवान के बयान ने वैचारिक बहस जरूर खड़ी की है। लेकिन पार्टी समर्थकों का कहना है कि राजू तिवारी की पहचान आरोपों से नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक निष्ठा से तय होती है। उन्होंने जातीय या तात्कालिक राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर संगठन और नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई।
आज, जब पार्टी पुनर्गठन के बाद अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है, तब समर्थकों का आरोप है कि “उसे फिर से कमजोर करने के लिए तरह-तरह की बातें उछाली जा रही हैं।”
जनाधार और क्षेत्रीय स्वीकार्यता
विधायक के रूप में अपने विधानसभा क्षेत्र में उनकी सक्रियता उनकी राजनीतिक ताकत का आधार है। उन्होंने संवाद और उपलब्धता को प्राथमिकता दी, जिससे विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच उनका सम्मान और स्वीकार्यता बनी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष की प्रभावशीलता केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि संगठनात्मक निरंतरता, कार्यकर्ता विश्वास और जनसंपर्क से तय होती है।
स्थायी प्रभाव और संगठनात्मक स्थिरता
साधु पासवान के बयान ने बहस जरूर छेड़ी है, लेकिन फिलहाल यह स्पष्ट है कि लोजपा (रामविलास) में राजू तिवारी का प्रभाव कम नहीं आंका जा रहा। आरोपों के बावजूद वे संगठन की केंद्रीय धुरी बने हुए हैं।
बिहार की राजनीति में यह प्रकरण केवल बयानबाजी बनकर रह जाएगा या व्यापक संगठनात्मक असर डालेगा- यह समय तय करेगा। फिलहाल संकेत यही हैं कि संकट में साथ निभाने की राजनीति ने राजू तिवारी को पार्टी संरचना में स्थायी स्थान दिलाया है। पार्टी के घोषित विजन “बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” के संदर्भ में संगठन के भीतर अक्सर यह कहा जाता है कि नेतृत्व और संगठन की इस जोड़ी में चिराग और राजू की भूमिका एक-दूसरे से जुड़ी हुई है।
