Thursday, March 19, 2026

राज्यसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जीत पर बिहार में जश्न की जगह मायूसी क्यों?

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अभय वाणीः चुनाव कोई भी हो, जीत के बाद जश्न तो होता ही है। अगर जश्न नहीं दिखे, तो जीत का मतलब कहीं न कहीं हार ही होता है। राज्यसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जीत के बावजूद उत्सव का अभाव बिहार की राजनीति में एक ऐसी ही असामान्य स्थिति को दर्शाता है। Nitish Kumar की इस राजनीतिक सफलता के बावजूद न तो सड़कों पर जश्न दिख रहा है, न ही कार्यकर्ताओं में उत्साह। बिहार में फैला यह सन्नाटा दरअसल एक गहरी राजनीतिक और भावनात्मक बेचैनी का संकेत है।

जनादेश: दल नहीं, चेहरा था केंद्र में

सवाल सीधा है-क्या बिहार ने वोट किसी दल को दिया था, या एक चेहरे को? सच यह है कि पिछले कई चुनावों में जनता ने नीतीश कुमार के नाम पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सत्ता सौंपी। यह जनादेश किसी “वैकल्पिक नेतृत्व” के लिए नहीं था, बल्कि एक स्थापित भरोसे के लिए था।

नेतृत्व परिवर्तन: संवैधानिक या भावनात्मक टकराव?

ऐसे में अगर वही चेहरा सक्रिय प्रदेश की राजनीति से हटकर राज्यसभा की ओर जाता दिखे, तो यह केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनभावनाओं के साथ सीधा टकराव है। जनता यह पूछ रही है-जब हमने एक नेता को चुनकर सत्ता सौंपी, तो उसकी जगह कोई और क्यों तय किया जा रहा है?

कार्यकर्ताओं की खामोशी: अंदरूनी बेचैनी का संकेत

यह “सन्नाटा” दरअसल एक मौन विरोध है। कार्यकर्ता, जो वर्षों से नीतीश कुमार के नेतृत्व में राजनीति करते आए हैं, आज असहज और असमंजस में हैं। उन्हें यह आशंका सता रही है कि कहीं उनकी राजनीति की पहचान ही न बदल जाए।

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पलटी की राजनीति और जनभावना की विडंबना

अब तक नीतीश कुमार के बार-बार “पलटी” मारने पर तीखी प्रतिक्रियाएं देने वाले लोग आज खुद उनसे उनके इसी फैसले पर पलटने की अपील कर रहे हैं। यह अपने आप में एक बड़ी राजनीतिक विडंबना है।

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जनता का एक बड़ा वर्ग मानता है कि राज्यसभा जाने का निर्णय पूरी तरह स्वेच्छा का नहीं, बल्कि किसी दबाव का परिणाम हो सकता है। ऐसे में आम लोगों और समर्थकों के बीच एक ही इच्छा उभरकर सामने आ रही है-काश, नीतीश कुमार एक बार फिर “पलट” जाएं, लेकिन इस बार सत्ता समीकरणों के लिए नहीं, बल्कि जनता की भावनाओं के सम्मान में।

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अगर वे राज्यसभा जाने का निर्णय छोड़कर बिहार की राजनीति में ही बने रहने का फैसला करते, तो शायद यही सन्नाटा फिर से जश्न में बदल सकता था।

लोकतांत्रिक विश्वास पर सवाल

लोकतंत्र में यह स्थिति खतरनाक संकेत देती है। अगर वोट किसी एक चेहरे पर लिया जाए और बाद में वही चेहरा बदल दिया जाए, तो यह जनादेश का सम्मान नहीं, उसकी सुविधा अनुसार व्याख्या बन जाती है।

आत्ममंथन का समय

नीतीश कुमार जैसे अनुभवी नेता के लिए यह समय आत्ममंथन का है। राजनीति केवल समीकरणों का खेल नहीं है; यह विश्वास और निरंतरता का तंत्र भी है। चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता के भरोसे को बनाए रखना उससे कहीं अधिक जरूरी है।

सन्नाटे में छिपा शोर

बिहार आज चुप है, लेकिन यह चुप्पी खाली नहीं है। इसमें सवाल हैं, असंतोष है और एक गहरा संदेश भी छिपा है। नीतीश कुमार के फैसले को लेकर जो खामोशी दिख रही है, वह दरअसल भीतर ही भीतर उबलती हुई प्रतिक्रिया है।

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यह वही बिहार है, जिसने बार-बार अपने नेता पर भरोसा जताया। लेकिन जब उसी भरोसे को अस्थिर होता हुआ महसूस किया जा रहा है, तो आवाजें सड़कों पर नहीं, मन के भीतर गूंज रही हैं।

यह “सन्नाटा” दरअसल एक ऐसा शोर है, जो अभी सतह पर नहीं है, लेकिन उसकी गूंज गहरी है। “जिसे चुना है, वही चाहिए”-यह केवल भावना नहीं, बल्कि एक स्पष्ट लोकतांत्रिक संदेश है। अगर इस छिपे हुए शोर को समय रहते नहीं सुना गया, तो आने वाले समय में यही सन्नाटा खुलकर सामने आएगा-और तब यह सिर्फ असंतोष नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक बदलाव की भूमिका बन सकता है।

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेय
आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।

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