पटनाः बिहार विधानसभा चुनाव से पहले तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेहत को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक-कहीं उन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ बताया जा रहा था, तो कहीं अचेत अवस्था में चलने की बातें उछाली जा रही थीं। विपक्ष ने भी इन दावों को हवा दी और कई बार सवाल उठाया कि क्या नीतीश अब पहले जैसे सक्रिय नहीं रहे।
लेकिन नई सरकार के गठन के बाद जिस तरह से नीतीश कुमार मैदान में उतरे हैं, उसने सभी चर्चाओं को उलट कर रख दिया है। मुख्यमंत्री बीते दिनों लगातार मीटिंग्स, निरीक्षण, दस्तावेज़ी समीक्षा और अफसरों के साथ ब्रीफिंग में जिस तेजी से सक्रिय नज़र आए, उसने 2005 वाले नीतीश कुमार की याद दिला दी है – जब वे अपने पहले कार्यकाल में “सुशासन” के एजेंडे के साथ तेज़ी से बदलावों की शुरुआत कर रहे थे।
सेहत पर उठे सवाल, लेकिन बदला हुआ अंदाज़
चुनावों से पहले सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक नीतीश की सेहत पर कई तरह के दावे किए गए थे। पर नई सरकार बनते ही तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई दी। वे लगातार विभागीय प्रेजेंटेशन में मौजूद रहे। कई लंबी बैठकों की अध्यक्षता की और अफसरों से रिपोर्ट कार्ड मांगा। इसके अलावें उन्होंने प्रदेश में विकास योजनाओं की व्यक्तिगत समीक्षा शुरू की है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार इस बार शुरुआती चरण में ही सिस्टम को “टाइट मोड” में लाना चाहते हैं।
वापसी पर 2005 वाले नीतीश ?
2005 में जब उन्होंने पहली बार सत्ता संभाली थी, तब बिहार में प्रशासनिक सुधारों, कानून-व्यवस्था, सड़क निर्माण, शिक्षा सुधार और पंचायतों में बदलाव की तेज़ रफ्तार दिखाई दी थी। अब उनकी हालिया सक्रियता देखकर राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि नीतीश शायद उसी रफ्तार को फिर से दोहराने की कोशिश में हैं। मीटिंग में उनका सीधा संदेश रहा- कोई विभाग सुस्ती न दिखाए, हर योजना का ज़मीनी असर दिखना चाहिए।
नीतीश के एक्शन से विपक्ष में बढ़ी असहजता
नीतीश के अचानक “ऐक्टिव मोड” में आने से विपक्ष ने भी अपना सुर बदला है। पहले जहां विपक्ष उनकी सेहत को मुद्दा बना रहा था, अब वही सवाल उठा रहा है कि यह सक्रियता “राजनीतिक रणनीति” है या “वास्तविक प्रशासनिक सुधार”।
सरकार के अंदर भी नए संकेत
नई कैबिनेट और नई राजनीतिक परिस्थितियों में नीतीश अपने प्रभाव को फिर मजबूती से स्थापित करते दिखाई दे रहे हैं। लंबित परियोजनाओं को समय पर पूरा करने पर जोर के साथ ही वे विभागों के बीच तालमेल के लिए विशेष निर्देश दे रहे हैं। इसके अलावे उनकी नज़र पंचायत और नगर निकाय स्तर पर पर है। वे लगातार निगरानी कड़ी करने का भी आदेश जारी किया है।

सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि नीतीश इस बार प्रशासनिक ढांचे को एक बार फिर से पटरी पर लाना चाहते हैं, और इसके लिए वे लगातार ग्राउंड कंट्रोल में रहेंगे।
चुनाव से पहले जो नीतीश कथित रूप से “कमज़ोर” और “बीमार” बताए जा रहे थे, वही नीतीश नई सरकार के शुरुआती दिनों में लगातार एक्टिव और निर्णायक नज़र आ रहे हैं।
यह सक्रियता अल्पकालिक है या लंबे समय तक जारी रहेगी-यह तो आने वाले महीनों में साफ होगा। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि नीतीश कुमार ने अपने आलोचकों को चुप करा दिया है और बिहार की राजनीति में एक बार फिर खुद को केंद्र में ला खड़ा किया है।

