पटनाः मिडिल-ईस्ट में जारी तनाव के बीच केंद्र सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि देश में LPG सहित सभी पेट्रोलियम उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता है और सप्लाई चेन पूरी तरह सुचारू है। आम जनता से अपील की जा रही है कि वे किसी भी तरह की घबराहट या पैनिक में आकर अतिरिक्त स्टॉक न करें। इसके साथ ही राज्यों को भी अलर्ट मोड पर रखा गया है, ताकि किसी तरह की कमी या अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न न हो।
हालांकि, जमीनी स्तर पर तस्वीर इससे अलग नज़र आ रही है-खासतौर पर बिहार जैसे राज्यों में। यहां प्रशासनिक सतर्कता के दावों के बावजूद गैस एजेंसियों की मनमानी ने आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। उपभोक्ताओं का आरोप है कि एजेंसी संचालकों पर न तो सरकारी निर्देशों का असर दिख रहा है और न ही किसी प्रकार की जवाबदेही का डर।
लंबी कतारें, खाली हाथ वापसी
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि लोग घंटों गैस एजेंसियों के बाहर कतार में खड़े रहने के बावजूद खाली हाथ लौटने को मजबूर हैं। कई उपभोक्ताओं का यह भी कहना है कि उनके नाम पर पहले से बुक किए गए सिलेंडर की डिलीवरी कहीं और कर दी जा रही है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आंकड़ों में स्थिति
- भारत में प्रतिदिन लगभग 28–30 लाख LPG सिलेंडरों की खपत होती है।
- सरकार के अनुसार, भारत के पास औसतन 20–25 दिन का LPG स्टॉक उपलब्ध रहता है।
- बिहार में ही करीब 1.5–2 करोड़ LPG उपभोक्ता हैं, जिनमें से बड़ी संख्या ग्रामीण क्षेत्रों से आती है।
- पिछले कुछ दिनों में कई जिलों में डिलीवरी में 20–30% तक देरी की शिकायतें सामने आई हैं।
इन आंकड़ों से साफ है कि कागजों पर आपूर्ति पर्याप्त होने के बावजूद वितरण प्रणाली में गंभीर खामियां हैं।
शिकायत तंत्र भी बेअसर
स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने ऑनलाइन पोर्टल, हेल्पलाइन नंबर और निगरानी के लिए नोडल अधिकारियों की तैनाती की है। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मामले को गंभीरता से ले रहे हैं और क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप (CMG) को सक्रिय रखा गया है। इसके बावजूद उपभोक्ताओं का आरोप है कि जमीनी स्तर पर इन व्यवस्थाओं का कोई खास असर नहीं दिख रहा। शिकायत दर्ज कराने के बाद भी न तो समय पर कार्रवाई होती है और न ही दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।
वितरण तंत्र विफल, निगरानी की कमजोरी
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट आपूर्ति की कमी से ज्यादा वितरण तंत्र की विफलता और निगरानी की कमजोरी का परिणाम है। अगर समय रहते एजेंसी स्तर पर सख्ती नहीं की गई, तो यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
व्यवस्था के दावों पर सवाल, उपभोक्ता बेहाल
सरकार जहां एक ओर पर्याप्त स्टॉक और सुचारू आपूर्ति का दावा कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत आम आदमी की परेशानी बयां कर रही है। गैस एजेंसियों की मनमानी और प्रशासनिक ढिलाई के बीच उपभोक्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। ऐसे में जरूरत है कि सिर्फ दावों से आगे बढ़कर सिस्टम को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए, ताकि आम जनता को राहत मिल सके।
