नई दिल्लीः देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े UGC Equity Regulation 2026 इस समय राष्ट्रीय बहस के केंद्र में हैं। इन नियमों को लेकर उठे कानूनी सवालों के बीच एक नाम लगातार सुर्खियों में है – अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन। Advocate Vishnu Shankar Jain की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई दलीलों के बाद Supreme Court of India ने इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी, जिससे यह मामला शिक्षा नीति से निकलकर अब संवैधानिक बहस का विषय बन चुका है।
क्या है UGC नियमों का विवाद?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 2026 में उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों से निपटने के लिए एक नया नियामक ढांचा लागू किया। इन नियमों का उद्देश्य कैंपस में समानता और समावेशन सुनिश्चित करना बताया गया।
विवाद नियमों के एक प्रावधान को लेकर उठा, जिसमें “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा को लेकर सवाल उठे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रावधान की भाषा ऐसी है जिससे सभी वर्गों के छात्रों के लिए कानूनी संरक्षण का दायरा स्पष्ट नहीं रह जाता। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामला गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठाता है और तब तक के लिए नियमों पर रोक लगा दी।
इस चुनौती में विष्णु शंकर जैन की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने तर्क दिया कि किसी भी भेदभाव-रोधी व्यवस्था को संवैधानिक समानता के सिद्धांत के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि यदि नियमों की भाषा स्पष्ट और सर्वसमावेशी नहीं होगी, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया जटिल हो सकती है और नए विवाद खड़े हो सकते हैं।
उनकी दलीलों के बाद अदालत ने माना कि नियमों की वैधता पर विस्तृत सुनवाई आवश्यक है और तब तक उन्हें लागू रखना उचित नहीं होगा।
कौन हैं विष्णु शंकर जैन?
विष्णु शंकर जैन सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एक एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (Advocate on Record) हैं। यह वह दर्जा है जो सुप्रीम कोर्ट में आधिकारिक रूप से याचिका दायर करने और पक्षकार का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति देता है।
वे संवैधानिक, नीतिगत और सामाजिक महत्व के मामलों में सक्रिय रूप से पैरवी करते रहे हैं। उनकी पहचान ऐसे वकील के रूप में बनती रही है जो सरकारी नीतियों, कानूनी प्रावधानों और ऐतिहासिक विवादों से जुड़े मामलों को न्यायिक समीक्षा के लिए अदालत तक ले जाते हैं।
विष्णु शंकर जैन द्वारा लड़े गए प्रमुख और विवादित मामले
ज्ञानवापी मस्जिद मामला (Gyanvapi Case)
यह वह मामला है जिसमें वाराणसी के ज्ञानवापी क्षेत्र में प्राचीन संरचना को लेकर कानूनी विवाद है। जैन ने हिंदू पक्ष की ओर से पैरवी करते हुए कहा कि “नमाज़ पढ़ने से कोई जगह मस्जिद नहीं हो जाती” और यह कि उस स्थल पर *इरादतन नमाज़ कराने का समर्थन करके किसी स्थल की धार्मिक पहचान नहीं बदली जा सकती।” यह मामला धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान और न्यायिक समीक्षा का केंद्र बना हुआ है।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद (Mathura Krishna Janmabhoomi)
मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान और शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में जैन ने हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व किया है और अदालत में अनुरोध किया है कि सारे संबंधित मुकदमों में उन्हें प्रतिनिधित्व दर्ज किया जाए। यह विवाद भूमि अधिकारों, ऐतिहासिक दावों और न्यायिक समीक्षा के केंद्र में है।
Places of Worship Act 1991 के खिलाफ संवैधानिक चुनौती
1991 के Places of Worship Act की संवैधानिक वैधता को जैन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और कहा कि यह कानून संवैधानिक मूल्यों से टकराता है तथा धर्म-विशेष के मामलों में पुरानी ऐतिहासिक जरूरतों को अनदेखा करता है। जैन ने यह भी तर्क दिया कि कानून की कट-ऑफ डेट (15 अगस्त 1947) असंगत है और 712 ईस्वी जैसी समय रेखा को आधार बनाया जाना चाहिए, ताकि न्यायिक अपीलें खुले तौर पर सुनी जा सकें।
मुर्शिदाबाद हिंसा पर याचिका
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हुई समाजिक हिंसा के बीच जैन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की मांग की, यह कहते हुए कि हिंसा से प्रभावित इलाकों में लोगों की सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया को बल मिलना चाहिए।
संभल जामा मस्जिद-हरिहर मंदिर विवाद
इस मामले में जैन हिंदू पक्ष की तरफ से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं और उन्हें धमकियाँ मिलने जैसे घटनाओं से भी गुजरना पड़ा। सामाजिक विवाद और भूमि पहचान के इस मुद्दे ने स्थानीय तनाव और सम्मुखता पैदा की।
अखिलेश यादव के खिलाफ मानहानि मुक़दमा
हाल ही में जैन ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी दायर किया, जिसमें उन्होंने केवल ₹1 रुपये का हर्जाना मांगा — यह संकेत देता है कि उनका लक्ष्य अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा और न्याय प्रक्रिया का उपयोग करना था, न कि वित्तीय लाभ उठाना।
विष्णु शंकर जैन की कानूनी छवि
- विष्णु शंकर जैन के करियर में ऐसे मामले शामिल रहे हैं जो धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान, भूमि-विवाद, कानूनी समानता, और संवैधानिक अधिकारों जैसे मूल मुद्दों को छूते हैं।
- वे गंभीर घरेलू विवादों से जुड़े मामलों की संवैधानिक समीक्षा और सरकारी नीतियों के खिलाफ याचिकाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं।
- उनके मामले न केवल न्यायिक प्रक्रियाओं को चुनौती देते हैं, बल्कि सामाजिक बहसों को भी आगे ले जाते हैं, जिससे शिक्षा नीति से लेकर धार्मिक स्थानों तक का प्रश्न न्यायपालिका के समक्ष आता है।
उनकी कानूनी छवि क्यों चर्चा में रहती है?
विष्णु शंकर जैन के मामलों में अक्सर ऐसे मुद्दे शामिल होते हैं जो धार्मिक पहचान, ऐतिहासिक दावे, संवैधानिक अधिकार और सरकारी नीतियों की वैधता से जुड़े होते हैं। उनके द्वारा उठाए गए कई प्रश्न अदालतों को यह तय करने की स्थिति में लाते हैं कि कानून और संविधान के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए।
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UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक ने Advocate Vishnu Shankar Jain को एक बार फिर राष्ट्रीय कानूनी बहस के केंद्र में ला दिया है। यह मामला अब सिर्फ शिक्षा नीति तक सीमित नहीं, बल्कि समानता, न्याय और संवैधानिक व्याख्या से जुड़ा व्यापक प्रश्न बन चुका है। जैन की भूमिका इस बात का उदाहरण है कि किस तरह एक कानूनी चुनौती नीति निर्माण को भी न्यायिक कसौटी पर ला सकती है।