पूर्वी चंपारणः बिहार की राजनीति में ‘बाहुबली’ शब्द अक्सर ताकत और प्रभाव के संदर्भ में इस्तेमाल होता है। लेकिन पूर्वी चंपारण के गोविंदगंज विधानसभा क्षेत्र में बाढ़ के बीच विधायक राजू तिवारी की तस्वीर इस शब्द को एक अलग संदर्भ देती नजर आई। यहां ताकत का प्रदर्शन किसी राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि गंडक के बढ़ते पानी और कमजोर पड़ते तटबंध के सामने दिखाई दिया—जब विधायक खुद कंधे पर बालू-मिट्टी से भरी बोरी उठाकर तटबंध को बचाने में जुट गए।
गोविंदगंज क्षेत्र इन दिनों गंडक नदी के उफान से जूझ रहा है। नेपाल में भारी बारिश के बाद गंडक का जलस्तर बढ़ने से पूर्वी चंपारण के कई इलाकों में बाढ़ की स्थिति बनी हुई है। क्षेत्र के अरेराज, संग्रामपुर, केसरिया और पहाड़पुर प्रखंडों की कई पंचायतें प्रभावित हुई हैं।
मननपुर में तटबंध पर बढ़ा दबाव
इसी बीच मननपुर गांव के पास चंपारण तटबंध में अचानक रिसाव शुरू हुआ। पानी के दबाव को देखते हुए तटबंध के कमजोर हिस्से को तत्काल बचाना जरूरी था। सरकारी मदद पहुंतकी उससे पहले राजू तिवारी मौके पर पहुंचे और ट्रैक्टर से लाई गई बालू और मिट्टी की बोरियां खुद अपने कंधे पर उठाकर रिसाव वाले स्थान तक पहुंचाने लगे। उनके साथ स्थानीय ग्रामीण और कार्यकर्ता भी राहत कार्य में जुट गए।
जब इंतजार से ज्यादा जरूरी हो गया काम
बाढ़ जैसी आपदा में प्रशासनिक तंत्र की अपनी प्रक्रिया होती है। लेकिन पानी किसी प्रक्रिया का इंतजार नहीं करता। तटबंध के कमजोर हिस्से से लगातार पानी का रिसाव हो रहा हो तो कुछ घंटे भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
ऐसे में विधायक का तर्क था कि प्रभावित लोग उनके अपने हैं और संकट की स्थिति में उनकी मदद करना उनकी जिम्मेदारी है। उनका कहना था कि सरकारी सहायता और प्रशासनिक व्यवस्था अपनी जगह है, लेकिन मदद पहुंचने तक सिर्फ इंतजार करते रहना उचित नहीं है। यही सोच उन्हें राहत और बचाव के काम में सीधे उतरने की ओर ले गई।
सिर्फ राहत सामग्री नहीं, तटबंध बचाने की कोशिश
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नेताओं का पहुंचना कोई नई बात नहीं है। आम तौर पर जनप्रतिनिधि प्रभावित लोगों से मिलते हैं, राहत सामग्री बांटते हैं और प्रशासन के अधिकारियों से बातचीत करते हैं।
राजू तिवारी की इस तस्वीर का अलग पहलू यह रहा कि वह तटबंध के उस हिस्से पर पहुंचे जहां तत्काल शारीरिक श्रम की जरूरत थी और खुद बोरी उठाने लगे।
तस्वीर में विधायक का कंधा बोरी के भार से झुका हुआ है और सामने गंडक का तेज बहाव है। उनके आसपास ग्रामीण भी बोरियां लेकर तटबंध को मजबूत करने में जुटे हैं। यह दृश्य किसी भाषण या प्रेस कॉन्फ्रेंस से ज्यादा सीधे तौर पर उस संकट की गंभीरता को दिखाता है, जिसका सामना इलाके के लोग कर रहे हैं।
गोविंदगंज में बाढ़ की चुनौती
गोविंदगंज विधानसभा क्षेत्र पूर्वी चंपारण जिले में आता है। वर्तमान में राजू तिवारी इस क्षेत्र के विधायक हैं। क्षेत्र में अरेराज, पहाड़पुर और संग्रामपुर प्रखंड शामिल हैं।
सितंबर के अंतिम सप्ताह में गंडक के जलस्तर में तेजी से वृद्धि के बाद इलाके में बाढ़ की आशंका बढ़ी थी। 27 सितंबर को राजू तिवारी के पुछरिया गांव पहुंचकर ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह देने की भी रिपोर्ट सामने आई थी।
इसके बाद स्थिति और गंभीर हुई और तटबंध के अलग-अलग हिस्सों पर दबाव बढ़ा। चंपारण तटबंध के टूटने की घटनाओं ने आसपास के इलाकों में बाढ़ का खतरा और बढ़ा दिया।
राजनीति से अलग एक जमीनी तस्वीर
बाढ़ के दौरान राजू तिवारी की सक्रियता पर राजनीतिक बयानबाजी भी हुई है। 2 अक्टूबर को मोतिहारी में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने क्षेत्र में चल रहे राहत एवं बचाव कार्यों की जानकारी दी और प्रशासन तथा स्थानीय युवाओं के प्रयासों का उल्लेख किया।
लेकिन तटबंध पर बोरी उठाते हुए उनकी तस्वीर का राजनीतिक बयानों से अलग एक जमीनी पक्ष भी है—आपदा की स्थिति में जनप्रतिनिधि की भूमिका केवल अधिकारियों से बात करने तक सीमित रहे या वह मौके पर उपलब्ध संसाधनों के साथ राहत कार्य में प्रत्यक्ष भागीदारी करे, यह बहस अलग हो सकती है। फिलहाल गोविंदगंज में बाढ़ ने जो तस्वीर सामने रखी है, उसमें विधायक खुद भी बचाव के काम में लगे दिखाई दिए।
‘बाहुबली’ की एक अलग तस्वीर
राजू तिवारी को राजनीति में ‘बाहुबली’ कहे जाने की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि हो सकती है। लेकिन गोविंदगंज की बाढ़ के बीच सामने आई तस्वीर में ‘बाहुबली’ शब्द को अगर एक रूपक की तरह देखें तो उसका अर्थ बदल जाता है।
यहां बाहुबल किसी विरोधी को दबाने के लिए नहीं, बल्कि पानी के वेग के सामने तटबंध को थामने के लिए इस्तेमाल होता दिखाई देता है।
एक तरफ गंडक का बढ़ता पानी है, दूसरी तरफ कमजोर पड़ता तटबंध और उसके पीछे बसे गांव। इसी बीच कंधे पर बोरी उठाए विधायक और उनके साथ खड़े ग्रामीण दिखाई देते हैं।
आपदा की घड़ी में राजनीति के बड़े-बड़े नारों से ज्यादा महत्वपूर्ण कभी-कभी ऐसी छोटी तस्वीरें हो जाती हैं—जहां जनप्रतिनिधि यह संदेश देने की कोशिश करता दिखाई देता है कि संकट के समय वह सिर्फ देखने नहीं, बल्कि साथ खड़े होने आया है।
संकट अभी खत्म नहीं हुआ
हालांकि बाढ़ का संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। तटबंधों की स्थायी सुरक्षा, प्रभावित गांवों में राहत, जलस्तर की निगरानी और बाढ़ के बाद पुनर्वास जैसी चुनौतियां आगे भी बनी रहेंगी। बिहार जल संसाधन विभाग ने भी 2026 की बाढ़ अवधि में तटबंधों और संवेदनशील स्थलों की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था और निगरानी तंत्र का प्रावधान किया है।



