Thursday, April 9, 2026

BNSS धारा 218: सरकारी कर्मचारियों को सुरक्षा या FIR में भ्रम? समझिए पूरा सच

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पटनाः हाल के समय में लागू हुई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 218 चर्चा के केंद्र में है। इस BNSS Section 218 का उद्देश्य न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों और अन्य लोक सेवकों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान अनावश्यक मुकदमों से सुरक्षा देना है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसकी व्याख्या को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। खासकर पुलिस महकमे में कई बार यह देखा गया है कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ FIR दर्ज करने में हिचक दिखाई जाती है, यह सोचकर कि पहले सरकार की अनुमति लेना जरूरी है।

FIR और अभियोजन में अंतर समझना जरूरी

दरअसल, BNSS Section 218 का सीधा संबंध FIR दर्ज करने से नहीं, बल्कि अभियोजन (prosecution) से है। कानून यह कहता है कि यदि किसी लोक सेवक के खिलाफ आरोप उसके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन से जुड़े हैं, तो उसके विरुद्ध अदालत में मुकदमा चलाने से पहले सक्षम सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी। लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हर मामले में FIR दर्ज करने से पहले ही अनुमति लेनी पड़ेगी। यही वह बिंदु है, जहां सबसे ज्यादा भ्रम पैदा होता है।

“आधिकारिक कर्तव्य” की पहचान कैसे करें?

पटना उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता कुलदीप नारायण दुबे कहते हैं-


कुलदीप नारायण दुबे, वरिष्ठ अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायलय

किसी भी मामले में सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि कथित कृत्य “आधिकारिक कर्तव्य” के दायरे में आता है या नहीं। यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपने पद का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए कोई निर्णय लेता है, या ड्यूटी के दौरान उससे कोई गलती या लापरवाही हो जाती है, तो ऐसे मामलों में उसे कानूनी सुरक्षा मिलती है। लेकिन यदि वही सरकारी सेवक ड्यूटी की आड़ में व्यक्तिगत लाभ के लिए कोई अनुचित या गैर-कानूनी कार्य करता है, तो BNSS की धारा 218 के तहत उसे कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी और उसके खिलाफ सीधे FIR दर्ज की जाएगी।


ऐसे मामलों में मिलती है कानूनी सुरक्षा:

  • गिरफ्तारी के दौरान बल प्रयोग को लेकर विवाद
  • किसी प्रशासनिक निर्णय में त्रुटि

➡️ ऐसे मामलों में आगे मुकदमा चलाने से पहले सरकार की अनुमति लेना आवश्यक होता है।

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ऐसे मामलों में नहीं मिलेगी कोई सुरक्षा

इसके उलट, यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपने पद का दुरुपयोग करता है, निजी लाभ कमाने की कोशिश करता है या अपराधियों के साथ मिलीभगत करता है, तो यह “आधिकारिक कर्तव्य” नहीं माना जाएगा।

स्पष्ट उदाहरण:

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  • रिश्वत लेना या आर्थिक लाभ उठाना
  • जांच में जानबूझकर तथ्यों को छिपाना या मैन्यूपुलेट करना
  • सबूतों के साथ छेड़छाड़ करना
  • आरोपी को बचाने के लिए केस कमजोर करना
  • निजी स्वार्थ में किसी को फंसाना
  • अपराधियों के साथ सांठगांठ (collusion)

➡️ ऐसे मामलों में:-

  • सीधे FIR दर्ज होगी
  • सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं होगी

कर्तव्य बनाम दुरुपयोग” का असली फर्क

यही वह महत्वपूर्ण अंतर है जिसे समझना बेहद जरूरी है-“कर्तव्य का पालन” और “कर्तव्य का दुरुपयोग”। धारा 218 केवल पहले मामले में सुरक्षा प्रदान करती है, दूसरे में नहीं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ हर स्थिति में पहले अनुमति लेना अनिवार्य है।

कानूनी सिद्धांत क्या कहता है?

कानूनी दृष्टि से भी यह स्थापित सिद्धांत रहा है कि किसी कार्य को तभी “आधिकारिक कर्तव्य” माना जाएगा, जब उसका उस कर्मचारी की जिम्मेदारियों से सीधा और तार्किक संबंध हो। यदि कोई व्यक्ति अपने अधिकार का इस्तेमाल ही गलत उद्देश्य से करता है, तो वह कर्तव्य का निर्वहन नहीं, बल्कि उसका दुरुपयोग है। ऐसे में कानून की सामान्य प्रक्रिया लागू होती है।

पुलिस के लिए सही अप्रोच क्या हो?

पुलिस के लिए भी यह जरूरी है कि वह हर मामले में तथ्यों का वस्तुनिष्ठ आकलन करे।

निर्णय का आधार:

  • यदि प्रथम दृष्टया मामला भ्रष्टाचार, निजी लाभ या मिलीभगत का है → FIR तुरंत दर्ज करें
  • यदि मामला ड्यूटी के दौरान लिए गए निर्णय से जुड़ा है → आगे बढ़ने से पहले अनुमति लें

निष्कर्ष: सुरक्षा ईमानदारी के लिए, न कि भ्रष्टाचार के लिए

अंततः, धारा 218 का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देना है, न कि भ्रष्टाचार या गलत आचरण को ढाल प्रदान करना। जहां कर्तव्य का ईमानदारी से पालन है, वहां कानून सुरक्षा देता है, लेकिन जहां पद का दुरुपयोग, आर्थिक लाभ, या अपराधियों से सांठगांठ है, वहां सीधे आपराधिक कानून लागू होता है और ऐसे मामलों में FIR दर्ज करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है।

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अभय पाण्डेय
अभय पाण्डेयhttp://www.newsstump.com
अभय पाण्डेय एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और जमीनी पकड़ के दम पर उनकी कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

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