“भय गति सांप-छुछुंदर”: UGC नियमों ने सरकार को दुविधा में डाला

अभय पाण्डेय

अभय वाणीः “भय गति सांप-छुछुंदर” – न निगलते बने, न उगलते। केंद्र सरकार की मौजूदा स्थिति को अगर किसी एक कहावत में बाँधना हो, तो शायद इससे सटीक उदाहरण दूसरा नहीं होगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए इक्विटी नियम (New UGC equity rule), जिन्हें उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव-मुक्त वातावरण बनाने के उद्देश्य से लाया गया था, अब सरकार के लिए ऐसी राजनीतिक और सामाजिक उलझन बन चुके हैं, जहाँ हर रास्ता जोखिम भरा दिखाई देता है।

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नीति की मंशा चाहे जितनी अच्छी नीयत वाली बताई जाए, ज़मीन पर उसका असर अलग दिशा में जाता दिख रहा है।

समानता की पहल, असुरक्षा की भावना

New UGC equity rule का घोषित उद्देश्य था-शिक्षा परिसरों में जाति, लिंग, धर्म, क्षेत्र या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना और शिकायतों के समाधान के लिए संस्थागत तंत्र बनाना। कागज़ पर यह पहल प्रगतिशील दिखती है, लेकिन जैसे ही इसकी संरचना और भाषा सार्वजनिक विमर्श में आई, यह मामला प्रशासनिक सुधार से अधिक सामाजिक पहचान के सवाल में बदल गया।

यहीं से सरकार की मुश्किलें शुरू हुईं। नीति ने समानता का संदेश देना चाहा, पर समाज के एक हिस्से ने इसे संतुलन बिगड़ने का संकेत माना।

सामान्य वर्ग की नाराज़गी: “हमें कटघरे में खड़ा किया जा रहा है”

सामान्य वर्ग के एक हिस्से में यह धारणा बनी कि शिकायत और सुरक्षा का ढांचा एकतरफा है। उन्हें लगा कि किसी भी विवाद की स्थिति में वे पहले से ही संदेह के घेरे में होंगे, जबकि उनके अधिकारों की सुरक्षा या झूठे आरोपों से बचाव का तंत्र उतना स्पष्ट नहीं है।

यह भावना तथ्य से अधिक धारणा का परिणाम हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में धारणा ही राजनीति की दिशा तय करती है। सरकार, जिसे लंबे समय से इस वर्ग का समर्थन मिलता रहा है, अब उसी आधार में असहजता का सामना कर रही है।

अवर्ण समाज की चिंता: “अब पीछे मत हटिए”

दूसरी ओर, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए यह नियम केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सुरक्षा और सम्मान का आश्वासन माने गए। जैसे ही विरोध बढ़ा और कानूनी चुनौती सामने आई, इन वर्गों में यह आशंका पैदा हुई कि सरकार कहीं दबाव में आकर अपनी प्रतिबद्धता से पीछे न हट जाए।

इस तरह सरकार एक विचित्र स्थिति में आ गई-एक ओर गुस्सा, दूसरी ओर अविश्वास। एक पक्ष को लगा सरकार पक्षपाती है, दूसरे को लगा सरकार डगमगा रही है।

सुप्रीम कोर्ट की रोक: मंशा नहीं, प्रक्रिया पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियमों पर अंतरिम रोक ने स्थिति को और पेचीदा कर दिया। अदालत की चिंता थी कि यदि किसी नीति की भाषा अस्पष्ट हो और उसके दुरुपयोग की संभावना हो, तो वह समानता के बजाय विभाजन का कारण बन सकती है।

यह टिप्पणी सरकार की नीयत पर नहीं, बल्कि नीति निर्माण की गुणवत्ता और स्पष्टता पर प्रश्नचिह्न थी। लेकिन राजनीति में संदेश यही गया कि सरकार जल्दबाज़ी में ऐसा ढांचा ले आई, जिसकी सामाजिक प्रतिक्रिया का अनुमान ठीक से नहीं लगाया गया।

सबसे मुखर है – सत्तापक्ष की चुप्पी

इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प और अर्थपूर्ण पहलू है सत्तारूढ़ दल के सांसदों, विधायकों और मंत्रियों की सावधान चुप्पी।

न ज़ोरदार समर्थन, न खुला विरोध। न विस्तार से बचाव, न स्पष्ट स्पष्टीकरण। जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बचते रहे, मानो यह कोई राजनीतिक बारूदी सुरंग हो, जिस पर गलत कदम भारी पड़ सकता है। यह चुप्पी बताती है कि मामला केवल नीति का नहीं, मतदाता समीकरणों का भी है-और यही सरकार की असहजता को उजागर करता है।

सरकार की ‘सांप-छुछुंदर’ वाली दुविधा

आज केंद्र सरकार जिस मोड़ पर खड़ी है, वहाँ हर निर्णय जोखिम से भरा है। नियमों को सख्ती से लागू करे तो सवर्ण असंतोष बढ़े। नियमों को कमजोर करे तो सामाजिक न्याय समर्थकों का भरोसा डगमगाए। चुप रहे तो नेतृत्वहीनता के आरोप लगें और खुलकर बचाव करे तो ध्रुवीकरण और तेज हो। यानी आगे भी कठिनाई, पीछे भी कठिनाई। यही तो है – “भय गति सांप-छुछुंदर”।

अब हालात ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ निर्णय टालना भी जोखिम है और निर्णय लेना भी। स्थिति “दुविधा में दोनों गए, माया मिले न राम” जैसी बनती जा रही है।

नीयत से ज्यादा ज़रूरी है संवाद

कुल मिलाकर यह विवाद दिखाता है कि सामाजिक रूप से संवेदनशील विषयों पर नीति बनाते समय केवल उद्देश्य सही होना पर्याप्त नहीं होता। भाषा स्पष्ट हो, प्रक्रिया सहभागी हो और संवाद व्यापक हो-यह उतना ही जरूरी है।

UGC के नियम शायद समानता की मंशा से बने, लेकिन संवाद की कमी और संतुलन की अस्पष्टता ने सरकार को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जहाँ वह सवर्ण और अवर्ण दोनों के संदेह के घेरे में दिखाई देती है।

अब रास्ता टकराव से नहीं, भरोसा बहाल करने से निकलेगा। लेकिन जब सरकार खुद अपनी बनाई दुविधा में फँस जाए, तो बाहर निकलने के लिए साहस, स्पष्टता और खुली बातचीत-तीनों की जरूरत होती है। फिलहाल, इन तीनों की कमी ही सबसे ज्यादा महसूस की जा रही है।

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आप एक युवा पत्रकार हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं को बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं दे चुके अभय ने वर्ष 2004 में PTN News के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इनकी कई ख़बरों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं।