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महारानी कामसुंदरी देवी: बचपन से राजमहल तक, मौन हुआ मिथिला का शाही इतिहास

पटनाः Maharani Kamsundari Devi Biography दरभंगा रियासत की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का सोमवार को निधन हो गया, जिसके साथ ही मिथिला के शाही इतिहास की एक जीवित कड़ी भी टूट गई, जिसने एक पूरे युग को वर्तमान से जोड़ रखा था। वह राजमहल की एक ऐसी शख़्सियत थीं, जिनके साथ इतिहास बोलता था। स्नेह और सम्मान से लोग उन्हें ‘माईजी’ कहते थे।

बचपन से राजमहल तक, और दरभंगा राज के आख़िरी अध्याय तक की यात्रा

कहा जाता है—राजमहलों में अक्सर कहानियाँ दीवारों में कैद रह जाती हैं, लेकिन माईजी उन विरले व्यक्तित्वों में थीं, जिनकी मौजूदगी से ही इतिहास जीवित हो उठता था। उन्हें सब ‘माईजी’ कहते थे—एक ऐसा संबोधन जिसमें सम्मान भी था, अपनापन भी और एक पूरा युग समाया हुआ था। उनका जाना केवल एक शोक समाचार नहीं, बल्कि राजतंत्र, परंपरा और मर्यादा के एक पूरे अध्याय का अवसान है।

जन्म और बचपन: संस्कारों में ढली एक शालीन व्यक्तित्व

महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म एक प्रतिष्ठित, परंपरावादी और धार्मिक परिवार में हुआ। उनका बचपन ऐसे समय में बीता, जब अनुशासन, मर्यादा और संस्कार जीवन की बुनियाद माने जाते थे। छोटी उम्र से ही उनमें संयम, गंभीरता और कम बोलकर अधिक सुनने की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी।

कहा जाता है कि वे बचपन से ही दिखावे से दूर और आत्मचिंतन में विश्वास रखने वाली थीं—गुण जो आगे चलकर उनकी पहचान बने।

शिक्षा: परंपरा और विवेक का संतुलन

उस दौर में महिलाओं की औपचारिक शिक्षा सीमित थी, लेकिन महारानी कामसुंदरी देवी को घरेलू शिक्षा के साथ धार्मिक ग्रंथों, संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं का गहन ज्ञान मिला। उनकी शिक्षा ने उन्हें केवल साक्षर नहीं, बल्कि विवेकशील और संतुलित व्यक्तित्व बनाया। वे मानती थीं कि ज्ञान का सबसे बड़ा प्रमाण आचरण होता है।”

महाराजा कामेश्वर सिंह से विवाह: राजमहल में प्रवेश

महारानी कामसुंदरी देवी का विवाह दरभंगा रियासत के अंतिम महाराजा महाराजा कामेश्वर सिंह से हुआ। यह विवाह केवल एक राजसी गठबंधन नहीं था, बल्कि उत्तरदायित्व और परंपरा की साझेदारी थी। महारानी कामसुंदरी देवी महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नि थीं।

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राजमहल में प्रवेश के बाद वे शाही जीवन का हिस्सा बनीं, लेकिन उन्होंने कभी सत्ता के प्रदर्शन को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। वे हमेशा पर्दे के पीछे रहकर परिवार, परंपरा और राजमहल की आंतरिक व्यवस्था को संभालने वाली शक्ति रहीं।

दरभंगा राज की महारानी, लेकिन सादगी उनकी पहचान

दरभंगा रियासत कभी भारत की सबसे समृद्ध रियासतों में गिनी जाती थी। महारानी कामसुंदरी देवी ने वह वैभव देखा, लेकिन उनका जीवन सादा वस्त्र, सीमित आभूषण और अनुशासित दिनचर्या तक ही सीमित रहा। राजमहल में रहते हुए भी उनका व्यवहार आम लोगों जैसा था—शांत, विनम्र और आत्मीय।

आजादी, रियासतों का अंत और एक मौन साक्षी

उन्होंने ब्रिटिश शासन, भारत की आज़ादी और रियासतों के विलय—तीनों दौरों को नज़दीक से देखा। जब राजतंत्र समाप्त हुआ और लोकतंत्र आया, तब माईजी ने इसे शांति और गरिमा के साथ स्वीकार किया।

महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन और दरभंगा राज के औपचारिक अंत के बाद भी वे टूटीं नहीं। वे अक्सर कहती थीं—राज चला गया, लेकिन संस्कार और जिम्मेदारी नहीं जानी चाहिए।”

धार्मिक आस्था और मिथिला संस्कृति की संरक्षक

महारानी कामसुंदरी देवी का जीवन गहरी धार्मिक आस्था से जुड़ा था। श्यामा माई मंदिर, पूजा-पाठ और मिथिला की परंपराएँ उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा थीं।

विवाह, तीज-त्योहार, पारंपरिक अनुष्ठान—इन सभी में वे परंपरा की जीवित मार्गदर्शक थीं। उनकी मौजूदगी में राजमहल केवल भवन नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक आत्मा लगता था।

विशेष कार्य और योगदान

हालाँकि वे सार्वजनिक मंचों से दूर रहीं, लेकिन उनके योगदान गहरे और स्थायी रहे—

  • धार्मिक एवं सांस्कृतिक संरक्षण
    मंदिरों, पूजा-परंपराओं और मिथिला संस्कृति के संरक्षण में उनकी अहम भूमिका रही।
  • राजमहल की सामाजिक मर्यादाओं की रक्षा
    उन्होंने राजपरिवार की परंपराओं और संस्कारों को अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुँचाया।
  • परोपकार और संवेदनशीलता
    कर्मचारियों, आश्रितों और ज़रूरतमंदों के प्रति उनका व्यवहार हमेशा मातृसुलभ रहा।
  • राजनीति से दूरी, संतुलन की मिसाल
    उन्होंने कभी विवाद या सत्ता संघर्ष का रास्ता नहीं चुना।

 ‘माईजी’: एक नाम नहीं, एक संस्था

दरभंगा राजमहल में उन्हें सब माईजी’ कहते थे। यह संबोधन केवल रिश्ते का नहीं, बल्कि सम्मान, भरोसे और अपनत्व का प्रतीक था। वे परिवार की बुज़ुर्ग थीं, परंपराओं की रखवाली करने वाली थीं और इतिहास की अंतिम जीवित गवाह भी।

अंतिम विदाई: इतिहास अब केवल स्मृति है

आज महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ यह स्पष्ट हो गया है कि दरभंगा राज का आख़िरी जीवित अध्याय भी समाप्त हो चुका है। राजमहल की दीवारें आज भी खड़ी हैं, लेकिन उन्हें अर्थ देने वाली आख़िरी आवाज़ अब मौन हो गई है।

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