अभय वाणीः बिहार में विकास पर बहस अक्सर सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और रोज़गार के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस बार विकास का एक नया, चमचमाता और चार पहियों पर दौड़ता पैमाना सामने आया है। इस पैमाने का इजाद किशनगंज जिले के ठाकुरगंज से जेडीयू विधायक गोपाल अग्रवाल ने किया है।
उन्होंने सदन में अपने भाषण के दौरान विकास की जो परिभाषा दी, उसने पूरे विमर्श को SUV गियर में डाल दिया। अग्रवाल ने कहा कि 2010 का चुनाव उन्होंने बोलेरो पर, 2015 का स्कॉर्पियो पर, 2020 का इनोवा पर और 2025 का चुनाव फॉर्च्यूनर पर सवार होकर लड़ा। उनके मुताबिक यही विकास का प्रमाण है। यानी बिहार में विकास अब ग्राफ, डेटा या योजनाओं से नहीं, बल्कि गाड़ी के मॉडल से मापा जाएगा।
सड़कें बनीं, क्या ज़िंदगी भी बदली?
विधायक ने अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए यह भी कहा कि आज बिहार का शायद ही कोई गांव ऐसा होगा जो सड़क से न जुड़ा हो। उनके अनुसार सड़क संपर्क का विस्तार ही राज्य में विकास की सबसे बड़ी पहचान है।
सड़क संपर्क में विस्तार निश्चित रूप से विकास का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सड़क पहुँच जाने भर से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की समस्याएँ भी उसी रफ्तार से हल हो जाती हैं?
बिहार में विकास की नई परिभाषा
माननीय विधायक जी के हिसाब से विकास का नया सूत्र है – इंजन पावर = प्रगति दर। अगर इस फ़ॉर्मूले को मान लिया जाए तो साफ है – जैसे-जैसे गाड़ी अपग्रेड, वैसे-वैसे प्रदेश भी अपग्रेड।
- बोलेरो का दौर – संघर्षशील विकास
- स्कॉर्पियो का दौर – उभरता विकास
- इनोवा का दौर – स्थिर विकास
- फॉर्च्यूनर का दौर – प्रीमियम विकास
बिहार के विकास का ‘लक्ज़री संस्करण’
बस दिक्कत इतनी है कि यह विकास सड़क पर तो दिखता है, लेकिन स्कूल और अस्पताल की कतारों में कम नज़र आता है। खैर, ये विधायक जी तो अभी फॉर्च्यूनर तक ही पहुँचे हैं; कई तो ऐसे भी हैं जो रेंज रोवर और डिफेंडर तक पहुँच चुके हैं। आगे जिस दिन ये विधायक जी फॉर्च्यूनर से उपर रेंज रोवर और डिफेंडर तक पहुँचेंगे, उस दौर को बिहार के विकास का ‘लक्ज़री संस्करण’ कहा जाएगा।
शिक्षा: जहाँ SUV नहीं, वहाँ विकास नहीं?
राज्य के अनेक सरकारी स्कूल आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। कहीं शिक्षकों की कमी है, कहीं भवन जर्जर हैं, तो कहीं बच्चों के बैठने तक की समुचित व्यवस्था नहीं।
लेकिन अगर विकास का पैमाना विधायक की सवारी है, तो शायद स्कूलों की हालत देखने की ज़रूरत ही नहीं। क्योंकि जब प्रतिनिधि फॉर्च्यूनर में हो, तो शिक्षा अपने आप “प्रीमियम” मान ली जानी चाहिए – कम से कम भाषणों में तो।
स्वास्थ्य: एंबुलेंस इंतज़ार में, विकास आगे निकल चुका
बिहार के कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और दवाइयों की कमी कोई नई बात नहीं। ग्रामीण इलाकों में मरीजों को बेहतर इलाज के लिए अक्सर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
लेकिन विधानसभा में विकास SUV के मॉडल से मापा जा रहा है। मरीज अब भी अस्पताल पहुँचने की जद्दोजहद में है, जबकि विकास एयरबैग, सनरूफ और ADAS के साथ तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ चुका है।
रोज़गार: युवाओं को नौकरी चाहिए, न कि नई गाड़ी की कहानी
राज्य के लाखों युवा आज भी रोज़गार की तलाश में ठसाठस भरी ट्रेनों से दूसरे राज्यों की ओर रुख करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाएँ, लंबी तैयारी और अनिश्चित भर्तियाँ – यही उनका वास्तविक विकास मॉडल है।
उनके लिए प्रगति का मतलब है नौकरी, स्थिर आय और सुरक्षित भविष्य। लेकिन राजनीतिक विमर्श में विकास अब चार पहियों पर बैठकर आता है, हाथ में जॉइनिंग लेटर लेकर नहीं।
SUV से आगे का सवाल
क्या विकास का मतलब जनप्रतिनिधियों की आर्थिक तरक्की है? या फिर जनता की जीवन गुणवत्ता में सुधार? अगर विकास बोलेरो से फॉर्च्यूनर तक पहुँच गया है, तो क्या वह स्कूल की टूटी बेंच, अस्पताल की खाली दवा अलमारी और बेरोज़गार युवा तक भी पहुँचा?
चमकती गाड़ियों के पीछे धुंधली ज़मीन
विधायक की गाड़ी का मॉडल बदलना निजी सफलता की कहानी हो सकती है, लेकिन उसे पूरे राज्य के विकास का प्रतीक मान लेना – यह व्यंग्य से ज़्यादा कुछ नहीं। क्योंकि जनता आज भी वहीं खड़ी है – नौकरी की लाइन में, अस्पताल की कतार में और सरकारी स्कूल की जर्जर इमारत के बाहर।
विकास अगर सच में हुआ है, तो वह सायरन बजाती SUV में नहीं, बल्कि बेहतर स्कूल, सक्षम अस्पताल और स्थानीय रोज़गार में दिखना चाहिए। बाकी, गाड़ियों का काफिला तो बढ़ता ही रहेगा – कौन जाने अगला चुनाव रेंज रोवर या डिफेंडर पर लड़ा जाए।
