आखिर सोशल मीडिया से नीतीश की नाराजगी क्यों ?

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पटना: मीडिया से नेताओं की नाराजगी नई बात नहीं है। वे पुचकारते हैं, तो रहमत की बारिश कर देते हैं…गुस्साते हैं तो रहमत पर भी आफत। इसीलिए मोदी बनाम गोदी मीडिया की फुसफुसाहट बीच-बीच में सुनाई पड़ती है। इन दिनों बिहार के सीएम नीतीश कुमार भी मीडिया से नाराज चल रहे हैं।

प्रिंट मीडिया के हलके में कोई उन पर गुर्राने वाला नहीं है। PRD विभाग विज्ञापन से मैनेज कर लेता है। प्रशासन के स्तर पर प्रबंधन को फटकार भी लगाई जाती है, तो चुनिंदा पत्रकार को निकालने या भाव देने की पैरवी भी होती है।

एक पत्रकार ने सालों पहले बताया था कि वह एक दिन पूर्व सीएम से मिलने गए। उन्होंने जब उस पत्रकार की बेहाली की बात सुनी तो कहा कि चाहो तो…को बोल दें, बहाल कर लेगा। यह एक उदाहरण भर है। रही-सही कसर वैसे पत्रकार भी उठा लेते हैं जो मालिकानों की कमजोर नस पहचान चुके हैं।

केंद्र के लेवल पर ऐसी मीडिया को पुरातनपंथी या शुचिता पसंद पत्रकार मोदी मीडिया कहते मिल जायेंगे। बाकी राज्यों के लिए उसी समूह ने गोदी मीडिया नाम दिया हुआ है।

हां, तो बात नीतीश और मीडिया से नाराजगी की…प्रिंट तो कहिए गोदी मीडिया की श्रेणी में आ चुका है। अब पिछले 4-5 साल से सक्रिय सोशल मीडिया वर्ग उभरा है तो उसे भी विज्ञापन और पैसों की जरूरत है। लेकिन भाव नहीं मिल रहा, लिहाजा वे लिखने के लिए स्वतंत्र हैं और यही नाराजगी का मूल कारण भी है। हालांकि सब ऐसे नहीं हैं। यह उनका साइट बताता है।

सोशल मीडिया पर कहां से उठा संशय

लीजिए न उपेंद्र कुशवाहा को नीच कहने के मामले को। सीएम ने क्या कहा और उसका क्या अर्थ निकला…बवाल कहां तक पहुंचा, बताने की जरूरत नहीं है। दलों में बरमंडल छिड़ा हुआ है। विवाद को हवा देने के लिए नीतीश कुमार सोशल मीडिया को ही जिम्मेवार मानते हैं।

इसे हाल के दिनों में अखबारों में भी पढ़ा गया है कि सीएम सबको सोशल मीडिया से सावधान कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर देश के कई और सीएम सक्रिय हैं लेकिन वे नाराज नहीं हैं। जानकार बताते हैं कि नवीन पटनायक का सारा काम डिजिटली ही मैनेज होता है और उनकी नाराजगी की खबर नहीं मिलती है।

डिजिटल और सोशल मीडिया बिहार में भूमिका

दरअसल सोशल मीडिया की, खासकर बिहार में अजीब सी भूमिका देखने को मिल रही है। इस पर सक्रिय कुछ जने तो नेताओं के डिजिटल मोर्चे को बकायदा संभाल भी रखे हैं। जाने-अनजाने इनके हाथों फेक न्यूज़ भी चल जाता है जो जाहिरा तौर पर टीआरपी या आका को खुश रखने के लिए होता है।

एक ही उदाहरण काफी है। तेजप्रताप के तलाक मामले में 29 नवंबर की सुनवाई के दिन का। कुछ प्लेटफार्म से खबर चलने लगी कि दिल्ली में राबड़ी देवी से मिलनकर वे अपना मन बदल चुके हैं। बस आना है और कोर्ट से अर्जी वापस ले लेनी है। लेकिन सुनवाई के बाद इस उम्मीद के विपरीत ही खबर आयी कि ऐसा नहीं हुआ और कोर्ट ने 8 जनवारी को उनकी पत्नी ऐश्वर्या को बुलाया है।

डिजिटल या सोशल मीडिया ऐसी हालत क्यों ?

दरअसल शाम में बपतिस्मा, सुबह में बन गये पोप। आज डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया इसी ढर्रे पर कथित तहलका मचा रही है। शब्दों की ऐंठन भर जुगाली, सनसनीखेज पजामों से ससरते नाड़ों को कमर पर टिकाती झूठी खबरें और इसी के सहारे बाजार में हनक। शायद यही वजह है कि जिसे मर्जी आये, पोर्टल खोलकर बैठ जाता है। भाषा गई तेल लेने, संपादन की कसौटी के मतलब नहीं। जिससे खुन्नस, उसी को लपेट लिया।

आंतरिक मैनेजमेंट से पर्दा उठाने की कसरत नहीं क्योंकि हिंदी में सैकड़ों न्यूज पोर्टल हैं और उनकी हजारों कहानियां, टीआरपी, फेसबुक से कनेक्शन। किसी संस्थान में नौकरी लगी है तो ठीक वरना पोर्टल खोल लिया। अकेले बिहार में सौ से अधिक पोर्टल लेकिन चंद ही भरोसा जमा पाने में सफल हुए हैं।

देखें अंग्रेजी के न्यूज़ पोर्टल

यहां यह रेखांकित करना जरूरी है कि अंग्रेजी अखबारों के पोर्टल दमदार हैं, क्योंकि प्रिंट के नेटवर्क की मजबूत दीवार उनके साथ है। उनके पास विज्ञापन है, गूगल है, अपडेट फोटो भी, एक्सक्लूसिव भी। ये सभी महानगरों के भव्य केबिनों से साजोसामान के बीच तैयार होते हैं।

जिनके पास प्रिंट मीडिया नहीं है उनके पोर्टल की हालत को बयां न करना ही बेहतर। बिहार में भी अंग्रेजी के पोर्टल हैं। प्रिंट मीडिया के पोर्टल से इतर नाममात्र के हैं जहां संसाधन नहीं, तकनीकी भव्यता नहीं, पर भरोसेमंद भी…हार्ड खबरें…हैंड नहीं..पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर, सब कुछ खुद ही करने की चुनौती।

डिजिटल मीडिया के प्रति भरोसा जगाना होगा

जरूरत इस बात की है कि डिजिटल पाठकों में खबरों के प्रति विश्वसनीयता बढ़ानी होगी तभी कोई इसे नये प्लेटफार्म से किसी को सावधान नहीं कर पायेगा। तभी भविष्य भी है वरना चार दिन की चांदनी…

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