वरिष्ठ पत्रकार मनोहर मनोज को NDTV के रवीश ने किया निराश

मैं पहले टीवी पत्रकार रवीश कुमार द्वारा मोदी पर उठाए जाने वाले अनेकानेक सवाल को औचित्य, तथ्य तथा पत्रकारीय धर्म की दृष्टि से सही मानता था, परन्तु उनके द्वारा किए गए राहुल गाँधी के साक्षात्कार से मुझे घोर निराशा हुई है। उनके साक्षात्कार में यह साफ झलका कि उनमें एक अन्तर्निहित कांग्रेस प्रेम है। वह कांग्रेस और राहुल पर बनने वाले सवालों को पूछने के बजाय केवल मोदी को घेरने वाले सवाल ही उनसे कर रहे थे।

इसमे कोई शक नहीं कि रवीश तुलनातमक रूप से एक बेहतर टीवी पत्रकार हैं। पर आज वह या तो राहुल से इंटरव्यू के दौरान नर्वस थे या उन्होंने अब तय कर लिया है कि बीजेपी समर्थक पत्रकारों की तरह वह भी कांग्रेस के एक पक्षकार की तरह काम करेंगे।

मेरी नज़र में रवीश को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से पूछना चाहिए था कि 125 साल पुरानी और देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी के दफ्तर के लॉन में केवल इंदिरा और राजीव के पोस्टर ही क्यों लगे हैं। कांग्रेस के वे असंख्य नेता क्या नेहरू-गांधी परिवार के आगे बौने थे, जिनका आज कहीं उल्लेख नहीं होता। यानी आज़ादी के बाद यह कांग्रेस नेहरू परिवार की जागीर क्यों बन गयी है।

रवीश को पूछना चाहिए था कि यह कांग्रेस पार्टी जो बारंबार सेक्युलरिज्म की रट लगाती है, क्या देश के सांप्रदायिक विभाजन को ना रोक पाने में उसकी विफलता की वजह से उसकी यह सेक्युलरिज्म बहुत पहले ही फेल नहीं हो गयी। रवीश को पूछना चाहिए था की आपने अमेरिकी राजदूत के समक्ष व्यक्तिगत मुलाक़ात में हिन्दू आतंकवाद को ज्यादा बड़ा खतरा बताया, यह क्या नहीं दर्शाता है कि आप राजनीतिक ही नहीं व्यक्तिगत रूप से भी हिन्दू विरोधी हैं। रविश को पूछना चाहिए था कि आज पूरी दुनिया हिन्दू आतंकवाद से परेशान है या इस्लामिक आतंकवाद से।

रवीश को पूछना चाहिए था कांग्रेस की योजनएं क्यों वास्तविक जनकल्याण का काम कम राजनीतिक पॉपुलिस्म से ज्यादा प्रभावित होती है। रवीश को पूछना चाहिए था कि कांग्रेस पार्टी ने ही सदैव से विपक्ष को पनपने से पहले कुचल देने और राजनीतिक बदले की भावना से काम करने की जो परिपार्टी शुरू की जिस परिपार्टी को बाजपेयी और अडवाणी ने तो नहीं अपनाया लेकिन मोदी सरकार वही कोंग्रेसी फार्मूला अपना रही है तो यह आपको तीखा क्यों लग रहा है।

रवीश को पूछना चाहिए था कि कांग्रेस पार्टी में आपके वालिदैन प्रधानमंत्री और अध्यक्ष पद दोनों अपने साथ क्यों रखते थे। रवीश को पूछना चाहिए था कि भ्रष्टाचार सभी सरकारों में कॉमन रहा, परन्तु महंगाई के मामले में कांग्रेस हमेशा चैंपियन क्यों रही है।

गौरतलब है कि नोटबंदी , जीएसटी को सरल के बजाय और पेचीदा कर प्रणाली बना देने तथा मोदी के वन मैन-शो पर रवीश अपने प्रोग्राम में लगातार सवाल उठाते रहे हैं जो उचित था, परन्तु आज राहुल के इंटरव्यू के दौरान उनके सवालों का औचित्य टांय टांय फिस्स हो गया।

बीजेपी समर्थक लोग रवीश के साथ राजदीप की भी ट्रोलिंग करते रहते है। पर मैंने राजदीप को अपने सवालों से कभी समझौता करते नहीं देखा। अभी कुछ ही दिन पहले ममता ने उनके सवाल पर बिदककर उन्हें बीजेपी का एजेंट बता दिया। विडंबना ये है की निष्पक्ष पत्रकार को तो सत्ताधारी लोग विपक्ष का एजेंट और विपक्ष के लोग सत्ताधारी का एजेंट बताते है। यहाँ तक की रजत शर्मा जिन्हे बीजेपी के टैग वाला पत्रकार कहा जाता है ,पर अपने प्रोग्राम आपकी अदालत में वह सवाल पूछने में कोई कटौती नहीं करते।

अंत में मैं कहूंगा की अगर भारत में पार्टीगत बौद्धिकी की बात करे तो कम से कम 1960 के बाद से देश का असल बौद्धिकपंथ कभी भी कांग्रेस के साथ फिट नहीं बैठा। आज मोदी राज की अधिनायकवादी शैली से भी फिट नहीं बैठती है, पर इसके बावजूद कांग्रेस के साथ उसके तालमेल के राह में ढेरों वैचारिक रोड़े है। यदि रवीश अपने को बौद्धिक पत्रकारिता के पहरुए मानते हैं तो उन्हें कांग्रेस मोह त्यागना होगा।

मनोहर मनोज, एडिटर इन चीफ इकोनॉमी इंडिया एन्ड एसोसिएट एडिटर, न्यूज़ स्टंप
Loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here