नारी को नारी ही रहने दीजिए, उसे जरुरत का सामान मत बनाइए

नई दिल्लीः सभ्यता और सांस्कृति के दृष्टिकोण से भारत महज एक मुल्क ही नहीं, माँ भी है। हम धारा प्रवाह बहने वाली जीवनदायिनी गंगा को नदी से बढ़कर माँ मानते हैं। जिस धरती पर हम जन्म से मरण तक तमाम करतब-क्रीड़ा करते हैं वो भी माँ ही है। इसी तरह धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो विद्या, वैभव और शक्ति से हम सबको परिपूर्ण करने वाली सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा भी माँ ही हैं।

हमारा वजूद कहता है जिसने हम सब को पैदा किया वो भी माँ ही है। यानी कुल मिलाकर नारी है तो माँ है…माँ है तो हम हैं, ये श्रृष्टि है। इसलिए नारी शक्ति राष्ट्र शक्ति है। लेकिन सियासी दृष्टिकोण से देखें तो माँ के हर रूप से इतर नारी महज एक सियासी मोहरा भर है, जिसके उत्थान का ताना-बाना रचकर सियासी दल अपनी रोटियां सेंकते हैं।

बात नारी के विकास की करें, तो राजनीतिक कंपनियों के सौजन्य से नारी देश में आधी आबादी का दर्जा प्राप्त कर चुकी है। उसे अब बस, ट्रेन, टिकट काउंटर पर ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती… सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि नारी अधुरी थी अधुरी है और इरादों से खोट नहीं निकला तो अधुरी ही रह जाएंगी।

सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में लगभग 48 % आबादी महिलाओं की है। राजनीतिक दलों को मिलने वाले वोट में इनकी भागीदारी भी खुब है। लिहाजा इनके उत्थान के नाम पर अक्शर सरकारें बड़ी-बड़ी बातें करती हैं। लेकिन आज देश में नारी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। सबलता की आस लगाए छली हुई नारी आज भी निर्बल असहाय और बेवस हैं।

आप अपने कोटरों से निकलिए, आंखों पर लगे पर्दे हटाकर झांकिए… सच्चाई दिख जाएगी। जिस देश में मि पिछले कई दसकों से मिशाल के तौर पर रानी लक्ष्मी बाई, इंदिरा गांधी, सरोजनी नायडू और ना जाने कितने ही नाम गिनवाए जाते हैं उस देश में महिलाओं की स्थिति क्या है?

हो सकता है आपके आस-पास, आपके घर में , गांव या प्रदेश में हालात कुछ अच्छे हों, लेकिन आप  वहां से बाहर निकलिए। वहां पांच सितारा होटलों में रात जरुर बिताइए, लेकिन मौका निकालकर शहर घुमिए, गांव घुमिए बड़े-बड़े कॉरपोरेट का मुआयना कीजिए हो सके तो कल-कारखानों और ईंट-भट्ठों का दौरा भी कर लीजिए। चेहरे पर असुरक्षा का भाव बता देगा दशकों तक नारी सम्मान के नाम पर देश में राज करने वाले समाज और सरकार ने महिलाओं को कितना सशक्त किया है।

हर रोज देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाली कितनी हीं बेटीयों को अपने असली नाम से भागकर दामिनी का नाम अपनाना पड़ता है, लेकिन आप तो बस इतना ही देख पाते हैं कि नारी गांव के पंचात से लेकर सदन तक बैठती है, लेकिन ये देखने की जहमत नही उठाते की इससे अलग नीजि जिंदगी में उनका वजूद क्या है। साहब जो नारी आपको बड़े-बड़े दफ्तरों, पंचायत या सदन में नजर आती हैं न, वो बस दिखावा है मर्जी तो उनके घर वाले की ही चलती है।

कुल मिलाकर आज दिन नारी का है। नारी की सशक्तिकरण पर पुरा देश पीठ थपथपा रहा हैं तो हमें भी गर्व कर लेना चाहिए। कम से कम एक दिन के लिए ही सही हमें भी मान लेना चाहिए की नारी का उत्थान हुआ है। हमारे पंचायत की मुखिया नारी है, आपके संसदिय क्षेत्र की सांसद नारी है, विधानसभा की विधायक नारी है। लेकिन गलती से भी उनके पति को नजरअंदाज मत करिएगा क्योंकि सिक्का  ही चलती है बाद बाकी सब काजग पर है।

खैर पीड़ा को पी जाने का नाम हीं नारी है, लेकिन सवाल ये उठता है कि नारी के नाम पर देश में हो रही सियासत आखिर क्यों और कब तक। कुछ नहीं कर सकते तो ठीक है, लेकिन भावनाओं से खेलना ठीक नहीं क्योंकि इतिहास गवाह है नारी के नयन से बहने वाले नीर तेजाब से भी ज्यादा ज्वलनशील होते हैं।

Loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here