देश से सवर्णों को मिटाने की राजनीति!

उत्तर प्रदेश में मायावती ने नारा दिया था “तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार।” तिलक माने कि ब्राह्मण। तराजू माने कि बनिया और तलवार यानी कि क्षत्रिय। इन सभी को जूते मारो!

क्या बात है! इतनी नफरत? एक दलित नेता साफ तौर पर सवर्णों को जूते मारने के लिए कह रही है और सभा में दलित तालियां बजा रहे हैं। बजाएं भी क्यों नहीं इन्हें बताया गया है कि 1000 वर्षों तक सवर्णों ने इनका शोषण किया है। कमाल की बात है कि दलितों के मन में सवर्णों के प्रति नफरत भरकर, सवर्णों को जूते मारने की बात कहकर ये नेता कहते हैं कि दोनों एक थाली में क्यों नहीं खाते?

हम मानते हैं कि कभी धर्म की खामियों के कारण दलितों को नुकसान हुआ था, किंतु अब भी यदि सवर्ण और दलित एक थाली में नहीं खा पा रहे तो उसकी असली वजह यह दलित राजनीति ही है…।

अच्छा! कमाल की बात यह भी है कि जो मायावती दलितों की ब्रांडेड नेता हैं, वह सवर्णों को जूते मार सकती हैं। फिर भी दबंग कौन? शोषक कौन जूते खाने वाला सवर्ण ही न! और शोषित कौन? जूते मारने वाली मायावती न!

जिस तरह खुलेआम सवर्णों को जूते मारने की बात की जाती है, यदि दलितों को कह दी जाए तो? बवाल मच जाएगा न? गाली पर ही गिरफ्तारी है, जूते पर क्या होगा? लेकिन, कितना आसान है सवर्णों को जूते मारना…।

यह कुछ जातियों को खुलेआम जूते मारने की बात कहना— क्या इससे बड़ा भी कोई मनुवाद हो सकता है? क्या मायावती से बड़ा कोई मनुवादी है? इसके बाद भी मनुवादी कौन है— सवर्ण! कितनी अजीब बात है कि  इस तरह के मनुवादी नेता खुद को ​दलित, शोषित, पिछड़ा बताते हैं और देश का संविधान तक मान लेता है? सिर्फ जाति के कारण। इतनी दुर्भावना! ओह! 1000 वर्षों का शोषित, सताया समाज है, यह तो जूते मार ही सकता है…।

बिहार में लालू प्रसाद ने कहा था “भूरा बाल साफ करो।“ भू यानी भूमिहार, रा यानी राजपूत, बा यानी ब्राह्मण और ल यानी लाला (कायस्थ)। भूरा बाल साफ करो यानी कि सवर्णों को साफ कर दो। इस तरह किसी और जाति को साफ करने की बात कभी किसी नेता ने कही है? कही जा सकती है? कह दे तो? बवाल मच जाएगा न? लेकिन, सवर्णों को साफ करने की बात कोई भी कह सकता है! और गजब की बात है कि फिर भी दबंग कौन है? शोषक कौन है? सवर्ण!

सवर्णों को सीधे साफ करने, मार देने की बातें मंचों से हो रही है लेकिन कहीं कोई एफआईआर नहीं! कोई गिरफ्तारी नहीं! कोई हो-हल्ला नहीं! सवर्ण मारा भी जाए तो कोई बात नहीं क्योंकि यह समाज 1000 वर्षों का ऐतिहासिक शोषक है। सवर्ण तो कहे भी कि उसे किसी ने गाली दी है तो नहीं माना जाएगा। उसे कोई गाली कैसे दे सकता है? और गाली दे भी दे तो उसे लग कैसे सकता है? गाली तो सिर्फ कथित दलित, पिछड़ों को आहत करती है…।

दलित, पिछड़ी राजनीति के नाम पर इस समय देश में सवर्णों के खिलाफ खुलेआम जहर बांटा जा रहा है। कभी सीधे-सीधे सवर्णों को साफ करने की बात कहकर तो कभी दलितों को खुश करने के लिए उन्हें जातीय आधार पर आरक्षण, नौकरी, प्रोन्नति देकर। देश में सवर्णों को साफ करने की बात ही नहीं कही जा रही, इसके लिए बकायदा इंतजाम किए जा रहे हैं।

धीरे-धीरे सबकुछ सवर्णों से छीना जा रहा है। पहचान के लिए बस अब मताधिकार ही रह गया है, जो बताता है कि सवर्ण इस देश का नागरिक है। इसके बाद भी उसके लिए कहीं कोई आवाज नहीं उठती क्योंकि सबको बताया गया है कि सवर्ण 1000 वर्षों का शोषक समाज है!

यह लेख युवा पत्रकार मृत्युंजय त्रिपाठी के फेसबुक से लिया गया है। देश के कई समाचार संस्थानों को सेवा दे चुके मृत्युंजय फिलहाल दैनिक जागरण में कार्यरत हैं।
 

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