सीबीआई तोता है, क्योंकि सियासत का हर सिक्का खोटा है…

बार-बार यह सवाल उठता है कि क्या केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) केंद्र सरकार का तोता है? तोता माने रट्टू, माने केंद्र के पिंजड़े में कैद, माने केंद्र का गुलाम है? किन्तु ऐसा क्यों है, यह सवाल कोई नहीं करता। इसे पिंजड़े का तोता बताने की राजनीति सभी करते हैं, मगर इसे कैद से आजाद कराने का प्रयास कोई नहीं करता। यह कैसे एक स्वायत्त संस्था बने, इस पर तो कोई बात नहीं करता। आइए, आज हम इन्हीं सब बातों पर बात करते हैं...।

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आंध्र प्रदेश की चंद्रबाबू नायडू सरकार के बाद अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी सीबीआई (तोता) को कैद करने की कोशिश की है। कह दिया है कि सीबीआई राज्य में नहीं घुस सकती। वाह…! अभी तक तो इन्हीं लोगों का आरोप था कि सीबीआई केंद्र का तोता है, माने कि उसे केंद्र सरकार ने गुलाम बना रखा है, फिर ये खुद ही उसे कौन सी आजादी दे रखे हैं? माने तुर्रम खां वाला यह डायलॉग कि सीबीआई को राज्य में घुसने नहीं देंगे, यह उसे गुलाम बनाने की चाहत नहीं तो और क्या है? उससे खुद को बचाने का हथकंडा नहीं तो क्या है? यह सब सीबीआई को केंद्र के साथ ही राज्यों तक का तोता बना देने का प्रयास नहीं तो और क्या है?

दरअसल, इस समय सीबीआई तोता ही है। सिर्फ भाजपा सरकार का नहीं, सभी दलों की सरकारों का। सिर्फ केंद्र का नहीं, राज्यों का भी। और इसे ये सभी मिलकर तोता ही बनाए रखना चाहते हैं, क्योंकि सभी ही इस तोते का अपने लिए इस्तेमाल करते हैं। अंतर बस यही है कि केंद्र राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जांच के लिए सीबीआई नामक तोते को आजादी दे देता है तो राज्य इस तोते को प्रतिद्वंद्वियों के घरों पर उड़ाने के लिए केंद्र से अनुरोध करते हैं। लेकिन, जब बात किसी अपने के खिलाफ जांच की हो तो केंद्र से लेकर राज्य सरकार सभी इस तोते को पिंजड़े में ही देखना पसंद करते हैं।

केंद्र के अधीन काम करने के कारण सीबीआई उसके विरुद्ध जांच की जहां खुद ही हिम्मत नहीं जुटा पाती, वहीं राज्य उसे अपनी सीमा में घुसने पर ही पाबन्दी लगा देते हैं। यह हर वह सरकार करती है, जो भ्रष्टाचार में लिप्त रही हो। वह चाहे केंद्र की सरकार हो या राज्य की। चाहे भाजपा की हो या कांग्रेस अथवा अन्य किसी भी दल की। लेकिन, नासमझ जनता गुमराह कर दी जाती है। वह इतना तक ही समझ पाती है कि सीबीआई सिर्फ केंद्र का तोता है। वह केंद्रीय जांच एजेंसी के ‘केंद्रीय’ को बहुत कुछ समझ लेती है जो कि वास्तव में कुछ भी नहीं है…।

सीबीआई यदि सच में केंद्रीय जांच एजेंसी होती तो यह कम से कम राज्यों का तो तोता न होती लेकिन हम देख रहे हैं कि जिस राज्य को जांच का डर सताता है, वही सीबीआई पर रोक लगा देता है। इस समय चन्द्र बाबू नायडू से लेकर ममता बनर्जी तक का यही हाल है। यह चोर हैं या नहीं, यह जांच के बाद स्पष्ट होता लेकिन इनके मन में चोर है, यह इन्होंने जांच एजेंसी को अपने राज्यों में न घुसने देने की बात कहकर स्पष्ट कर दी है। अब तो सीबीआई को इन राज्यों में जरूर ही दस्तक देनी चाहिए मगर सवाल है कि गुलाम तोता मुक्त आकाश में उड़े तो कैसे? सीबीआई तोता है, जानने के बाद आइए जानें कि यह तोता क्यों है…।

इस समय जबकि देश को एक सशक्त राष्ट्रीय जांच एजेंसी की आवश्यकता है जो बेरोकटोक देश में कहीं भी, किसी भी भ्रष्टाचार की जांच कर सके, हैरानी है कि सीबीआई अभी तक ठीक से अपने नाम के अनुरूप ‘केंद्रीय’ तक नहीं हो पाई है। हकीकत यह है कि सीबीआई 1946 में स्थापित होने के बाद आज भी “दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट एक्ट- 1946” से ही संचालित होती है। यानी इसके दायरे में बस दिल्ली है। हां केंद्र शासित प्रदेश भी। लेकिन, क्या इसकी हद यही होनी चाहिए? इस क़ानून के सेक्शन 6 के मुताबिक़, दूसरे किसी राज्य में कार्रवाई करने के लिए इसे उस राज्य की लिखित इजाज़त लेनी होती है। क्यों? क्या सीबीआई का कानून ही काफी नहीं है इसे तोता बनाए रखने के लिए? क्या आरोपित ही तय करेगा कि उसकी जांच की जाए या नहीं? क्या आरोपित तय करेगा कि उसकी तलाशी ली जाए या नहीं? उसके घर में घुसा जाए या नहीं? और जब तक ऐसा होता रहेगा, क्या सीबीआई से निष्पक्षता की उम्मीद है? है तो क्यों? यह उम्मीद मूर्खता ही तो है।

फिर इस तरह के कानून रहने पर सीबीआई को दोष देना भी एक साजिश हो तो है जबकि दोषी वे सभी राजनीतिक पार्टियां हैं जो आज तक इसे तोता बनाई हुई हैं। अरे भाई! इस तरह के कानून से बंधी जांच एजेंसी केंद्र से लेकर राज्य सरकारों का तोता ही तो बनेगी! खुद सोचिए कि वह पुलिस क्या जांच करेगी जिसे चोर से ही पूछना पड़ जाए कि “श्रीमान, क्या मैं आपके खिलाफ जांच कर सकता हूँ? क्या मैं आपके घर में घुस सकता हूँ? क्या मैं आपकी तलाशी ले सकता हूँ?” और आप क्या उम्मीद करते हैं कि वह चोर इसकी इजाजत देगा?

अब सवाल यह है कि जिस देश को आजाद हुए सात दशक हो गए, उस देश की केंद्रीय जांच एजेंसी अभी तक गुलाम (तोता) है ही क्यों? तो जवाब यह है कि इसके तोता रहने में ही सभी भ्रष्टाचारियों का फायदा है। चूंकि सभी ही राजनीतिक दल भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, कुछ कम या ज्यादा तो सभी सीबीआई को पिंजड़े में ही कैद रखना चाहते हैं, कुछ कम या ज्यादा। इन सभी को डर है कि यदि सीबीआई को एक स्वायत्त संस्था बना दी गई, इसका अलग कानून बना दिया गया, इसे राष्ट्रीय जांच एजेंसी का नाम देते इसे इसके अधिकार भी दे दिए गए तो यह तोता तो आसमान में उड़ेगा, लेकिन भ्रष्टाचार के सभी तोते इसके पिंजड़े में कैद होंगे। यह डर पूर्व की कांग्रेस सरकार से अभी की भाजपा सरकार तक को है, यह डर आंध्र से लेकर पश्चिम बंगाल सरकार तक को है…।

आप सोचिए तो सही, जो कांग्रेस इस समय सीबीआई को भाजपा सरकार का तोता बताती है, उसने आजादी के बाद से अभी तक क्या खुद एक बार भी इस संस्था को पिंजड़े से आजाद करने के बारे में सोचा? अभी वह किस मुंह से कहती है कि भाजपा सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है? सच्चाई तो यह है कि यदि कांग्रेस ने सीबीआई को तोता बनाकर न रखा होता और यदि सच में सीबीआई स्वतंत्र राष्ट्रीय जांच एजेंसी के रूप में कार्य करती तो इस समय सर्वाधिक मामले कांग्रेस के खिलाफ ही दर्ज होते और अधिकतर में नेहरू-गांधी परिवार ही आरोपित होता।

इस समय भी हेराल्ड मामले में माँ-बेटे सोनिया-राहुल जमानत पर हैं। लेकिन, यह भी तभी है जबकि इनकी अपनी सरकार इस समय नहीं है। कुछ यही बात भाजपा पर भी लागू होती है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से लेकर नरेंद्र मोदी सरकार तक ने अपने पिंजड़े में सीबीआई को कैद रखा। जिस मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान कर ही सत्ता पाई, वह भी साहस न जुटा पाए कि सीबीआई का अलग अधिनियम हो।

मोदी ने राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए यह कानून तो बनाया कि दलों को चन्दा देने वाले का नाम कोई नहीं पूछ सकता, यह कानून भी बनाया की गैरकानूनी विदेशी चंदा कानूनी हो गया, वोट बैंक के लिए एससीएसटी संशोधन अधिनियम भी बनाया लेकिन सीबीआई एक्ट बनाने की जहमत नहीं उठाई। यदि मोदी ने ऐसा किया होता तो अभी भाजपा दहाड़ न पाती कि उसके खिलाफ घोटाले का कोई मामला दर्ज नहीं है। अभी सीबीआई के अंदर मचे घमासान का कारण भी राजनीतिक ही है। दरअसल, सीबीआई एक्ट बनाकर देश को एक सशक्त जांच एजेंसी का उपहार दिया जा सकता है लेकिन चूंकि सियासत का हर सिक्का खोटा है, इसलिए सीबीआई अभी तक तोता है…।

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यह लेख युवा पत्रकार मृत्युंजय त्रिपाठी के फेसबुक से लिया गया है। देश के कई समाचार संस्थानों को सेवा दे चुके मृत्युंजय फिलहाल दैनिक जागरण में कार्यरत हैं।

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